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संपादकीय
25 Jul, 2026

अनशन टूटा, आंदोलन बिखरा : दिल्ली की लड़ाई क्यों हुई कमजोर

राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक का आंदोलन नेतृत्व की कमी, आपसी मतभेदों और कमजोर रणनीति के कारण बिखर गया है।

नई दिल्ली, 25 जुलाई।

देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले 25 दिनों से गूंज रही आवाज अब धीमी पड़ गई है। कारण न कोई सरकारी लाठी है, न आपातकाल, बल्कि आंदोलन के भीतर की फूट, नेतृत्व की नासमझी और सोनम वांगचुक के अचानक अनशन तोड़ देने का फैसला है। जिस आंदोलन को युवा पीढ़ी की आखिरी उम्मीद बताया जा रहा था, वह आज एक थके-हारे समझौते और आपसी आरोप-प्रत्यारोप के बीच दम तोड़ता नजर आ रहा है।

सच कड़वा है, लेकिन यही सच है। केंद्र सरकार ने न बंदूक चलाई, न जेलें भरीं। उसने केवल समय का इंतजार किया और आंदोलन को उसकी अपनी कमजोरियों के साथ आगे बढ़ने दिया। सोनम वांगचुक का अनशन जब टूटा तो लगा कि शायद कोई रास्ता निकला होगा, लेकिन 24 घंटे के भीतर मंच पर जो कुछ हुआ, उसने यह संकेत दिया कि आंदोलन के भीतर गंभीर मतभेद मौजूद हैं। एक ओर सरकार से बातचीत की बात हो रही थी, तो दूसरी ओर मंच से एक-दूसरे पर आरोप लगाए जा रहे थे। ऐसे हालात किसी भी आंदोलन को कमजोर कर देते हैं।

लद्दाख की मांग वाजिब थी। पर्यावरण की चिंता भी उचित थी और संविधान की छठी अनुसूची को लेकर उठे सवाल भी महत्वपूर्ण थे। इसी कारण देश ने सोनम वांगचुक के 25 दिन के अनशन को गंभीरता से लिया। मीडिया ने उसे प्रमुखता दी और जनता ने भी ध्यान से सुना। लेकिन किसी भी आंदोलन की सफलता केवल मांगों की मजबूती से नहीं, बल्कि नेतृत्व की स्पष्ट रणनीति, अनुशासन और एकजुटता से तय होती है। यदि आंदोलन के भीतर समन्वय ही न रहे तो उसका असर स्वतः कम हो जाता है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि नेतृत्व पूरी तरह दिशाहीन दिखाई दिया। मंच से जुड़े विभिन्न पक्ष अलग-अलग दावे करते रहे। कोई इसे जीत बता रहा था, कोई धोखा। ऐसे में आम कार्यकर्ता का स्वाभाविक सवाल था कि आगे की रणनीति क्या है। जब नेतृत्व के पास स्पष्ट दिशा नहीं होती तो आंदोलन भटक जाता है और ऐसी स्थिति में सरकार पर दबाव भी स्वतः कम हो जाता है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान उस आम नागरिक का हुआ, जिसने उम्मीद की थी कि उसकी आवाज दिल्ली तक पहुंचेगी। उन युवाओं का भी भरोसा कमजोर हुआ, जो रोजगार, पर्यावरण और नीति से जुड़े मुद्दों को लेकर इस आंदोलन से जुड़े थे। लोकतंत्र में विरोध की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन यदि आंदोलन का चेहरा ही बिखर जाए तो भविष्य में अन्य आंदोलनों की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठते हैं।

पच्चीस दिन का अनशन कोई साधारण बात नहीं है। इसके लिए त्याग और धैर्य चाहिए। लेकिन यदि उसके बाद आंदोलन अपनी दिशा खो दे तो यह बताता है कि तैयारी अधूरी थी और संगठनात्मक मजबूती पर्याप्त नहीं थी। किसी भी जन आंदोलन के लिए अनुशासन, एकजुटता और साझा एजेंडा सबसे आवश्यक होते हैं। इनके अभाव में बड़ी से बड़ी पहल भी कमजोर पड़ जाती है।

अब यदि इस आंदोलन को फिर से खड़ा होना है तो सबसे पहले अपनी कमियों को स्वीकार करना होगा। नेतृत्व को आत्ममंथन करना होगा, कार्यकर्ताओं का विश्वास दोबारा जीतना होगा और स्पष्ट रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है, लेकिन विरोध का अर्थ अव्यवस्था नहीं होता। अनशन तपस्या है, सौदेबाजी नहीं; मंच एकता का प्रतीक है, टकराव का नहीं। लद्दाख की समस्याएं आज भी मौजूद हैं। यदि उन्हें समाधान तक पहुंचाना है तो आंदोलन को भावनाओं से नहीं, बल्कि अनुशासन, धैर्य और मजबूत नेतृत्व के साथ आगे बढ़ना होगा।

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