वाशिंगटन, 25 जुलाई।
वाशिंगटन से आई एक घोषणा ने पूरी दुनिया के साथ भारत के फार्मा उद्योग को भी हिला कर रख दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका में बिकने वाली जेनेरिक दवाओं पर 200 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है। यह टैरिफ 1 अगस्त 2026 से लागू होगा और 2029 तक इसे चरणबद्ध तरीके से बढ़ाया जाएगा। यानी 2026 में 100 प्रतिशत, 2028 में 150 प्रतिशत और 2029 में 200 प्रतिशत टैरिफ लगेगा। इसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा, क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा निर्यातक देश है और अमेरिका भारत की दवाओं का सबसे बड़ा बाजार है।
भारत हर साल अमेरिका को लगभग 84 हजार करोड़ रुपये की दवाएं निर्यात करता है, जो भारत के कुल फार्मा निर्यात का 38 प्रतिशत है। यानी अमेरिका में बेची जाने वाली हर तीन जेनेरिक दवाओं में से एक भारत में बनी होती है। भारतीय दवाएं सस्ती और गुणवत्तापूर्ण होने के कारण अमेरिकी नागरिकों और वहां की सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि इन दवाओं पर 200 प्रतिशत टैरिफ लग जाता है तो उनकी कीमत कई गुना बढ़ जाएगी और इसका सीधा बोझ अमेरिकी मरीजों पर पड़ेगा। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि अमेरिका दवाओं के लिए दूसरे देशों पर अत्यधिक निर्भर हो गया है और कोविड महामारी के दौरान इस निर्भरता के खतरे सामने आए थे। इसलिए वह घरेलू दवा निर्माण को बढ़ावा देना चाहता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इतने कम समय में अमेरिका अपनी जरूरत की दवाएं न तो पूरी तरह स्वयं बना सकता है और न ही भारत जैसी कम लागत पर तैयार कर सकता है। ऐसे में इस टैरिफ का सबसे बड़ा असर अंततः अमेरिकी उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा।
भारत के लिए यह चुनौती जितनी बड़ी है, उतना ही बड़ा अवसर भी है। यदि भारतीय दवाएं महंगी हो गईं तो अमेरिका दूसरे देशों से आयात बढ़ाने का प्रयास करेगा। वियतनाम, बांग्लादेश और कुछ यूरोपीय देश इस अवसर की तलाश में हैं। दूसरी ओर भारत की अनेक छोटी और मझोली फार्मा कंपनियां, जिनका बड़ा कारोबार अमेरिकी बाजार पर निर्भर है, आर्थिक दबाव में आ सकती हैं। इनके पास इतना लाभांश नहीं है कि वे अतिरिक्त टैरिफ का बोझ आसानी से सहन कर सकें। फिर भी भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशाल जेनेरिक दवा निर्माण क्षमता है। देश में तीन हजार से अधिक फार्मा कंपनियां और साढ़े दस हजार से अधिक विनिर्माण इकाइयां हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अमेरिकी एफडीए से मान्यता प्राप्त सैकड़ों उत्पादन संयंत्र भारत में संचालित हैं। यही क्षमता इस संकट को अवसर में बदल सकती है, बशर्ते सरकार और उद्योग मिलकर दूरदर्शी रणनीति अपनाएं।
भारत को सबसे पहले अमेरिका के साथ बातचीत के जरिए इस टैरिफ को कम कराने या टालने का प्रयास करना चाहिए। दोनों देशों के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते में फार्मा क्षेत्र को अलग श्रेणी में रखा जा सकता है। भारत यह तथ्य भी सामने रख सकता है कि भारतीय दवाओं के कारण अमेरिका को हर वर्ष अरबों डॉलर की बचत होती है और यदि टैरिफ लागू हुआ तो अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। साथ ही अब केवल अमेरिकी बाजार पर निर्भर रहने की नीति भी बदलनी होगी। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया और यूरोप में भारतीय दवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही है। सरकार को इन बाजारों में निर्यात बढ़ाने के लिए विशेष नीति, निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं का विस्तार और भारतीय दवा ब्रांडों को वैश्विक पहचान दिलाने पर जोर देना चाहिए।
भारत को केवल जेनेरिक दवाओं तक सीमित रहने के बजाय अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाना होगा, ताकि नई दवाओं और बायोलॉजिक उत्पादों के क्षेत्र में भी मजबूत उपस्थिति बनाई जा सके। साथ ही एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट (एपीआई) के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना जरूरी है, क्योंकि आज भी 60 प्रतिशत से अधिक एपीआई चीन से आयात किया जाता है। राज्य सरकारों को गुजरात, हैदराबाद और हिमाचल प्रदेश जैसे फार्मा क्लस्टरों में आधारभूत सुविधाएं, परीक्षण प्रयोगशालाएं, कॉमन फैसिलिटी सेंटर और लॉजिस्टिक हब विकसित करने चाहिए, ताकि छोटी कंपनियों को भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती मिल सके।
दुनिया अब व्यापार को भी भू-राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है। ऐसे में भारत को न घबराने की जरूरत है और न ही लापरवाही की। भारतीय फार्मा उद्योग ने 2008 की वैश्विक मंदी, कोविड महामारी और सप्लाई चेन संकट जैसी चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया है। सरकार को उद्योग के साथ लगातार संवाद बनाए रखते हुए कर राहत, निर्यात प्रोत्साहन और अनुसंधान सहायता जैसे कदम समय पर उठाने होंगे। 200 प्रतिशत टैरिफ की घोषणा निश्चित रूप से एक बड़ा झटका है, लेकिन यह अंत नहीं है। भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी जेनेरिक दवा निर्माण क्षमता, कुशल वैज्ञानिक और विशाल घरेलू बाजार है। यदि इन तीनों शक्तियों का सही उपयोग किया गया तो भारत न केवल इस संकट से उबर जाएगा, बल्कि वैश्विक फार्मा मानचित्र पर अपनी स्थिति और अधिक मजबूत करेगा। स्वास्थ्य व्यापार की वस्तु नहीं है और दवाओं पर अत्यधिक टैरिफ का सबसे बड़ा नुकसान अंततः मरीजों को ही उठाना पड़ता है। इसलिए उम्मीद है कि दोनों देशों के बीच संवाद से व्यावहारिक समाधान निकलेगा, लेकिन तब तक भारत को आत्मनिर्भरता की दिशा में अपने प्रयास और तेज करने होंगे।














