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संपादकीय
25 Jul, 2026

नगर निगम को बड़े हादसों का इंतजार क्यों?

शहर में हजारों जर्जर भवनों को लेकर नगर निगम की सुस्त कार्रवाई और प्रशासन की लापरवाही के चलते बड़े हादसों का गंभीर खतरा लगातार बना हुआ है।

भोपाल, 25 जुलाई।

शहर के बीचों-बीच खड़े जर्जर भवन अब टाइम बम बन चुके हैं। अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार शहर में कुल 3435 भवन जर्जर घोषित हैं। इनमें 757 भवन अति जर्जर, 740 सरकारी और 600 ऐसे हैं, जिन पर पहले ही नोटिस जारी हो चुके हैं। इसके बावजूद अब तक केवल 35 भवन ही गिराए जा सके हैं। सवाल सीधा है कि इतनी बड़ी संख्या में खतरनाक भवनों की पहचान के बाद भी नगर निगम कार्रवाई में इतना पीछे क्यों है? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?

नगर निगम का काम केवल नोटिस जारी करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि खतरा पूरी तरह टल जाए। 2184 नोटिस जारी हो चुके हैं, लेकिन कार्रवाई केवल 35 भवनों तक सीमित है। इसका अर्थ है कि अधिकांश मामलों में फाइलें आगे नहीं बढ़ीं। यदि कोई भवन अति जर्जर घोषित है तो उसमें रहने वालों की जान हर दिन जोखिम में है। फिर भी कार्रवाई की रफ्तार बेहद धीमी है।

अक्सर तर्क दिया जाता है कि भवन मालिक न्यायालय चले जाते हैं या पुनर्वास की मांग करते हैं। यह तर्क पूरा सच नहीं है। कानून स्पष्ट कहता है कि यदि कोई भवन जनजीवन के लिए खतरा है तो प्रशासन उसे तत्काल खाली कराकर ध्वस्त कर सकता है। पुनर्वास और मुआवजे की प्रक्रिया बाद में भी चल सकती है। यदि वर्षों पहले चिन्हित भवन आज तक नहीं गिराए गए तो यह कानूनी बाधा से अधिक प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी है।

समाधान कठिन नहीं है। अति जर्जर भवनों को तय समय-सीमा में खाली कराकर गिराया जाए, सरकारी भवनों को प्राथमिकता मिले और निजी भवनों के लिए पुनर्वास की स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए। साथ ही प्रत्येक भवन की स्थिति सार्वजनिक डैशबोर्ड पर नियमित अपडेट की जाए। जर्जर भवन केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि संभावित मौत का कारण हैं। रोकथाम हमेशा सस्ती होती है, जबकि हादसे के बाद का शोक और नुकसान कहीं अधिक महंगा पड़ता है। अब समय कार्रवाई का है, इंतजार का नहीं।

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