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संपादकीय
25 Jul, 2026

ई-20 का ढोल और उपभोक्ता पर प्रहार: आत्मनिर्भरता के नाम पर मध्यमवर्ग की जेब पर डाका

ई-20 पेट्रोल के अनिवार्य होने के बाद पुरानी गाड़ियों में आ रही तकनीकी समस्याओं और घटते माइलेज ने आम उपभोक्ताओं का बजट बिगाड़ दिया है।

इंदौर, 25 जुलाई।

देश आत्मनिर्भर बने, किसान खुशहाल हो और प्रदूषण कम हो, यह सुनने में बहुत अच्छा लगता है। सरकार ने यही सोचकर ई-20 पेट्रोल को पूरे देश में लागू किया, पर जमीनी हकीकत यह है कि इस आत्मनिर्भरता की कीमत आज वही चुका रहा है, जिसके पास पहले से कुछ नहीं बचा था। वह है मध्यमवर्गीय उपभोक्ता।

सर्विस सेंटरों के बाहर लगी लंबी लाइनें चीख-चीखकर एक ही बात कह रही हैं कि ई-20 पेट्रोल ने पुरानी गाड़ियों की कमर तोड़ दी है। सरकार कह रही है कि ई-20 से कच्चे तेल का आयात घटेगा और विदेशी मुद्रा बचेगी। चीनी मिलें और इथेनॉल कंपनियां कह रही हैं कि अब फसल का सही दाम मिलेगा। कार कंपनियां कह रही हैं कि 2023 के बाद बने सभी इंजन ई-20 के अनुरूप हैं, इसलिए नई गाड़ियों में कोई दिक्कत नहीं। सर्विस सेंटर वाले कह रहे हैं कि काम बढ़ गया है, इसलिए धंधा चमक गया है।

उधर उपभोक्ता कह रहा है कि टंकी फुल कराते ही माइलेज गिर गया। वह कह रहा है कि कार्बोरेटर, फ्यूल पंप, इंजेक्टर और रबर पाइप एक के बाद एक खराब हो गए। वह कह रहा है कि हर महीने पेट्रोल का बिल तो बढ़ा ही, अब सर्विस का बिल भी घर का बजट बिगाड़ रहा है। यही है ई-20 की हकीकत—कहीं खुशी, कहीं गम और बीच में पिस रहा आम आदमी।

सर्विस सेंटरों की पड़ताल बताती है कि जून से जुलाई के बीच फ्यूल सिस्टम की शिकायतें 20 प्रतिशत बढ़ गई हैं। पहले जहां एक दिन में 25 से 30 गाड़ियां आती थीं, अब 50 से 55 गाड़ियां रोज आ रही हैं। फ्यूल फिल्टर साफ कराने वाली गाड़ियों की संख्या 20 से बढ़कर 30 हो गई है। सबसे ज्यादा मार उन वाहनों पर पड़ी है, जो पांच से सात साल पुराने हैं।

कंपनियों का तर्क है कि यह सामान्य घिसावट है और समय पर सर्विस न कराने से ऐसा होता है। पर उपभोक्ता पूछता है कि घिसावट अचानक ई-20 आने के बाद ही क्यों बढ़ी? उपभोक्ता पूछता है कि अगर नई गाड़ियों में दिक्कत नहीं है, तो देश में दौड़ रही 80 प्रतिशत पुरानी गाड़ियों का क्या होगा? क्या उन्हें कबाड़ में बेच दिया जाए?

यह मानने में कोई बुराई नहीं कि इथेनॉल से किसान को फायदा होगा और देश को ऊर्जा सुरक्षा मिलेगी, लेकिन नीति बनाते समय उपभोक्ता को क्यों भुला दिया गया? पूरे देश में एक साथ ई-20 लागू कर दिया गया। पेट्रोल पंप पर विकल्प नहीं दिया गया। अगर आपकी गाड़ी ई-20 के अनुकूल नहीं है, तब भी आपको वही पेट्रोल डलवाना पड़ेगा। यह जबरदस्ती नहीं तो क्या है?

कंपनियों को पहले से यह निर्देश नहीं दिया गया कि वे 2023 से पहले बिके वाहनों के लिए मुफ्त अपग्रेड किट दें। आज वही किट सर्विस सेंटर हजारों रुपये में बेच रहे हैं और उपभोक्ता लाचार होकर उसे खरीद रहा है। माइलेज गिरने की भरपाई के लिए पेट्रोल पर टैक्स में भी कोई राहत नहीं दी गई। जब खर्च बढ़ रहा है, तो कम से कम टैक्स तो कम किया जाए, पर वहां भी चुप्पी है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि इथेनॉल में नमी सोखने की क्षमता ज्यादा होती है। इससे फ्यूल सिस्टम में जंग लगती है, रबर और प्लास्टिक के पार्ट्स जल्दी खराब होते हैं और माइलेज दो से तीन किलोमीटर प्रति लीटर तक गिर सकता है। कंपनी इसे तकनीकी बात कहकर टाल देती है, पर घर चलाने वाले को हर किलोमीटर की कीमत पता होती है। एक तरफ पेट्रोल महंगा, दूसरी तरफ माइलेज कम और तीसरी तरफ सर्विस का खर्च—इन सबने मध्यमवर्ग के बजट की रीढ़ तोड़ दी है।

फायदा किसको हुआ? सरकार को, क्योंकि आयात बिल घटा। किसान को, क्योंकि गन्ने का भुगतान समय पर हुआ। इथेनॉल प्लांट मालिकों को, क्योंकि फैक्ट्रियां 24 घंटे चल रही हैं। कार कंपनियों को, क्योंकि लोग नई ई-20 अनुरूप गाड़ियां खरीदने को मजबूर हैं। सर्विस सेंटरों को, क्योंकि रिपेयरिंग का काम दोगुना हो गया।

नुकसान किसको हुआ? उसको, जिसने 2019 में कर्ज लेकर गाड़ी ली थी। उसको, जो रोज 40 किलोमीटर नौकरी के लिए बाइक चलाता है। उसको, जो हर महीने घर का हिसाब मिलाता है और पाता है कि 2,000 रुपये पेट्रोल में और 3,000 रुपये सर्विस में चले गए।

समय रहते आंखें न खोली गईं, तो उपभोक्ता का भरोसा टूट जाएगा। पेट्रोल पंप पर ई-10 और ई-20 दोनों का विकल्प दिया जाए, ताकि जिसकी गाड़ी पुरानी है, वह अपना पेट्रोल चुन सके। सरकार कंपनियों पर दबाव बनाए कि वे 2023 से पहले के सभी वाहनों के लिए फ्यूल सिस्टम अपग्रेड किट मुफ्त में दें। इसकी लागत कंपनियां और सरकार मिलकर उठाएं। जब तक माइलेज की समस्या बनी हुई है, तब तक पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) में राहत दी जाए, ताकि उपभोक्ता को थोड़ी राहत मिल सके। एक स्वतंत्र एजेंसी से ई-20 के प्रभाव पर अध्ययन कराया जाए और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, ताकि सच और अफवाह में फर्क पता चल सके।

विकास का मतलब सिर्फ बड़े आंकड़े नहीं होता। विकास का मतलब यह भी होता है कि आम आदमी का चूल्हा जलता रहे। ई-20 अपने आप में खराब नीति नहीं है, लेकिन उसे लागू करने की जल्दबाजी, उपभोक्ता को अंधेरे में रखना और यह सोच कि किसान खुश है तो उपभोक्ता अपने आप निपट लेगा, उचित नहीं कही जा सकती।

देश में दो भारत दिख रहे हैं। एक भारत जश्न मना रहा है कि हम इथेनॉल के क्षेत्र में दुनिया में आगे बढ़ रहे हैं। दूसरा भारत सर्विस सेंटर के बिल को देखकर सिर पकड़ रहा है। सरकार को तय करना है कि उसे किस भारत के साथ खड़ा होना है। अगर ई-20 का ढोल इसी तरह बजता रहा और उपभोक्ता का घाव इसी तरह रिसता रहा, तो एक दिन लोग कहेंगे कि आत्मनिर्भरता के नाम पर हमारी जेब काट ली गई। और तब न तो कोई नीति बचेगी और न ही किसी नीति पर भरोसा।

इसलिए अभी भी वक्त है। सुधार कीजिए, विकल्प दीजिए और उपभोक्ता को इस जश्न में शामिल कीजिए, वरना यह जश्न सिर्फ कागजों और भाषणों तक ही रह जाएगा।

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आज का राशिफल

अपने हितैषी समझे जाने वाले ही पीठ पीछे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगे। नये-नये व्यापारिक अनुबंध होंगे। किसी से वाद-विवाद अथवा कहासुनी होने का भय रहेगा। मानसिक एवं शारीरिक शिथिलता पैदा होगी। जल्दबाजी में कोई भूल संभव है। आय-व्यय की स्थिति समान्य रहेगी। शुभांक-5-7-8

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