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प्रेरक कहानियाँ
25 Jul, 2026

सौ साल का मौन

काशी के विश्वनाथ मंदिर में सौ वर्षों से मौन पड़े प्राचीन घंटे के एक चोर और एक छोटी बालिका के सम्मिलित प्रयासों से अचानक बज उठने की इस अनोखी घटना ने समाज को अपनी त्रुटियों को स्वीकार करने का एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है।

काशी के विश्वनाथ मंदिर में एक घंटा था जो सौ साल से नहीं बजा था, क्योंकि उसे बजाने के लिए पाप रहित हाथ चाहिए थे। कहते हैं औरंगजेब के समय में जब मंदिर टूटा, तब पुजारियों ने एक बड़ा पीतल का घंटा कुएँ में छिपा दिया। जब अहिल्याबाई ने मंदिर फिर बनवाया, घंटा निकाला गया। महंत ने उस पर संस्कृत में खुदवाया, यह घंटा वही बजाए जिसके मन में चोरी, झूठ और हिंसा न हो।

लोग आए, राजा आए, साधु आए। सबने रस्सी खींची। घंटा हिला तक नहीं। धीरे-धीरे लोगों ने कोशिश छोड़ दी। घंटा मंदिर के कोने में लटकता रहा, धूल जमती रही। बच्चे पूछते, बाबा यह बजता क्यों नहीं। पुजारी कहते, पाप रहित हाथ अब कलियुग में कहाँ। एक बार माघ की अमावस्या को काशी में भारी भीड़ थी। उसी रात गाँव गाजीपुर से माधो नाम का एक चोर काशी आया। वह पंद्रह साल से चोरी करता था। पहले मजबूरी में, फिर आदत में। उस रात उसने सोचा, विश्वनाथ के दर्शन करने वालों की भीड़ में किसी सेठ की थैली मिल जाएगी।

वह घाट पर नहाया भी नहीं, सीधे मंदिर की गली में घुसा। भीड़ में धक्का लगा, एक बूढ़ा गिर पड़ा। माधो ने उसे उठाया। बूढ़े की लाठी टूट गई। माधो ने अपनी धोती फाड़कर लाठी बाँध दी। बूढ़ा बोला - बेटा! भगवान् तुम्हारा भला करे। माधो हँसा, मेरा भला भगवान् नहीं करता। वह मंदिर पहुँचा। आरती हो रही थी। पुजारी ने कहा - आज कोई पाप रहित है तो घंटा बजाकर दिखाए। भीड़ हँसी। माधो कोने में खड़ा था। उसने सोचा, मैं तो पापी हूँ, पर घंटा देखूँ तो सही।

वह धीरे-धीरे घंटे के पास गया। रस्सी पर हाथ रखा। तभी पीछे से एक आवाज आई, मत छू। वह मुड़ा, देखा एक सात साल की लड़की, मैली फ्रॉक, हाथ में मिट्टी का दीया। लड़की बोली - तुम बजाओगे तो बजेगा नहीं, सब हँसेंगे। माधो बोला - तू कौन है? लड़की बोली - मैं गंगा किनारे फूल बेचती हूँ। माँ बीमार है। आज दीया चढ़ाने आई हूँ। पंडित जी ने कहा था घंटा पापी से नहीं बजता। माधो ने पूछा - तू पापी है? लड़की हँसी, मैंने कल एक बेर चुराकर खा लिया था, माँ को दवा के लिए पैसे नहीं थे।

माधो का हाथ रुक गया। उसने पहली बार किसी को अपने जैसा देखा। आरती खत्म हुई। भीड़ छँटने लगी। लड़की ने दीया जलाकर शिवलिंग के पास रखा, फिर लौटकर बोली - तुमने उस बूढ़े को उठाया था, मैंने देखा। माधो चौंका, तू वहाँ थी। लड़की बोली - हाँ। तुम चोर हो न। माधो ने सिर झुका लिया। लड़की ने उसकी हथेली पकड़ी और कहा, चलो दोनों खींचते हैं। पाप आधा-आधा बँट जाएगा।

माधो हँसा, पाप बँटता नहीं। फिर भी उसने लड़की का हाथ पकड़ लिया। दोनों ने मिलकर रस्सी खींची। पहले कुछ नहीं हुआ। फिर घंटा हल्का सा हिला। धूल झरी। दूसरी बार खींचा, एक धीमी गूँज निकली, टन। तीसरी बार दोनों ने पूरी ताकत लगाई। घंटा बजा। सौ साल बाद काशी का वह घंटा बजा। आवाज ऐसी गूँजी कि कबूतर उड़ गए, पुजारी थाली छोड़कर दौड़े, भीड़ रुक गई। पुजारी चिल्लाया, किसने बजाया। माधो डर गया, भागने लगा। लड़की ने उसका कुर्ता पकड़ लिया, बोली - भागो मत।

पुजारी ने देखा, एक चोर और एक फूलवाली।

वह बोला - असंभव। तुम दोनों पापी हो। माधो ने हाथ जोड़कर कहा - महाराज! मैं चोर हूँ। मैंने जीवन में सैकड़ों जेबें काटीं। आज भी चोरी करने आया था। पर इस बच्ची ने मेरा हाथ पकड़ा। इसने कहा पाप बाँट लेते हैं। मैंने सोचा अगर पाप बाँट सकते हैं तो शायद पुण्य भी। लड़की बोली - मैंने बेर चुराया था।

पुजारी चुप रहा। महंत आए। उन्होंने घंटा देखा, रस्सी देखी। बोले - सौ साल में पहली बार बजा है। शास्त्र कहता है पाप रहित हाथ चाहिए। इसका अर्थ तुमने गलत समझा। लोगों ने पूछा, क्या अर्थ है। महंत बोले - पाप रहित का अर्थ निष्पाप होना नहीं, अपने पाप को जानना है। जो अपने पाप को छिपाता है, उसका हाथ भारी होता है। जो कहता है मैं पापी हूँ, मुझे क्षमा करो, उसका हाथ हल्का हो जाता है। आज इस घंटे को दो हल्के हाथों ने छुआ है, एक ने चोरी मानी, एक ने बेर चुराना माना। घंटा रोज बजने लगा।

उस रात के बाद महंत ने नियम बदल दिया। अब आरती से पहले पुजारी कहता, जिसने आज कोई भूल की हो, आए और घंटा बजाए। पहले दिन कोई नहीं आया। दूसरा दिन एक हलवाई आया, बोला - मैंने घी में मिलावट की। उसने रस्सी खींची, घंटा बजा। फिर एक छात्र आया, बोला - मैंने माँ से झूठ बोला। घंटा बजा। माधो ने चोरी छोड़ दी। वह गंगा किनारे नाव चलाने लगा। लड़की का नाम गौरी था। माधो ने उसकी माँ का इलाज कराया। गौरी अब फूल नहीं बेचती, मंदिर में दीया जलाती है।

लोग पूछते हैं, घंटा अब रोज कैसे बजता है। पुजारी हँसकर कहता है, क्योंकि काशी में अब लोग पाप छिपाते नहीं, मान लेते हैं। सौ साल का मौन इसलिए नहीं था कि दुनिया में कोई पवित्र नहीं था। मौन इसलिए था कि सब खुद को पवित्र समझते थे। जिस दिन हम अपने भीतर की चोरी, अपना छोटा सा बेर चुराना, स्वीकार कर लेते हैं, उसी दिन हमारे हाथ भी घंटा बजा देते हैं। और काशी का वह घंटा आज भी बजता है, हर शाम, किसी न किसी हल्के हाथ से।

सीख और विचार
  • अपनी गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं, साहस है

    माधो चोर था और गौरी ने भी अपनी छोटी-सी गलती स्वीकार की। दोनों ने अपने दोष छिपाने की कोशिश नहीं की।

    सीख: जो व्यक्ति अपनी गलतियों को स्वीकार कर लेता है, उसके भीतर परिवर्तन का द्वार खुल जाता है।

  • अंहकार मन को भारी बनाता है

    सौ वर्षों तक घंटा इसलिए नहीं बजा क्योंकि लोग स्वयं को निर्दोष और श्रेष्ठ समझते रहे।

    सीख: जब हम खुद को पूर्ण मान लेते हैं, तब सीखना और आगे बढ़ना बंद कर देते हैं।

  • परिवर्तन की शुरुआत स्वीकारोक्ति से होती है

    माधो ने चोरी छोड़ दी क्योंकि उसने पहली बार अपने जीवन को ईमानदारी से देखा।

    सीख: जीवन बदलने के लिए सबसे पहला कदम है — अपने सच का सामना करना।

  • ईश्वर को पूर्णता नहीं, सच्चाई प्रिय है

    महंत ने समझाया कि पाप रहित होने का अर्थ कभी गलती न करना नहीं, बल्कि अपनी भूलों को पहचानना है।

    सीख: ईश्वर के सामने सबसे बड़ा आभूषण सच्चा और विनम्र हृदय है।

आज रात सोने से पहले 5 मिनट अकेले बैठिए और स्वयं से पूछिए:

  • आज मैंने कौन-सी छोटी या बड़ी गलती की? क्या मैंने किसी से झूठ बोला, किसी का दिल दुखाया या कोई गलत व्यवहार किया?

  • फिर उस गलती को एक कागज़ पर लिखिए और मन ही मन उसे सुधारने का संकल्प लीजिए।

याद रखिए, जिस दिन हम अपने भीतर के अंधकार को पहचान लेंगे, उसी दिन हमारे जीवन का भी घंटा नई चेतना के साथ बज उठेगा। 

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आज का राशिफल

अपने हितैषी समझे जाने वाले ही पीठ पीछे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगे। नये-नये व्यापारिक अनुबंध होंगे। किसी से वाद-विवाद अथवा कहासुनी होने का भय रहेगा। मानसिक एवं शारीरिक शिथिलता पैदा होगी। जल्दबाजी में कोई भूल संभव है। आय-व्यय की स्थिति समान्य रहेगी। शुभांक-5-7-8

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