भोपाल, 25 जुलाई।
मध्यप्रदेश में एक दशक बाद पदोन्नति आदेश जारी हुए हैं। बीते दस वर्षों में जो कर्मचारी बिना पदोन्नति के सेवानिवृत्त हो गए, उनकी पीड़ा अब भी अनसुनी है। पदोन्नति में आरक्षण का विवाद, जिसकी शुरुआत वर्ष 2002 में कांग्रेस सरकार के दौरान हुई थी, उसके दुष्प्रभाव आज भी जारी हैं। कर्मचारियों को इसका खामियाजा लंबे समय से भुगतना पड़ रहा है और इसका राजनीतिक नुकसान भी कांग्रेस को उठाना पड़ा।
मध्यप्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण की कहानी दिग्विजय सिंह सरकार के समय शुरू हुई। उस दौर में कुछ अधिकारियों ने शासन में "डिवाइड एंड रूल" की नीति को बढ़ावा दिया। इसके प्रमुख चेहरों में तत्कालीन मुख्यमंत्री के सचिव अमर सिंह का नाम चर्चित रहा। हालांकि कर्मचारियों को इसका नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन अमर सिंह का राजनीतिक भविष्य सफल रहा और वे पंजाब से सांसद बने।
दिग्विजय सरकार की पदोन्नति नीति को वर्ष 2016 में हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया था। तब से कर्मचारियों और अधिकारियों की पदोन्नतियां रुकी हुई थीं। इस दौरान जितने भी मुख्यमंत्री रहे, उन्होंने मामला न्यायालय पर छोड़कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली।
वर्तमान में जारी पदोन्नतियां भी न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी। यदि अदालत का फैसला राज्य सरकार की नीति के विरुद्ध जाता है तो इन पदोन्नतियों पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। ऐसा पहले उत्तर प्रदेश में हो चुका है, जहां मायावती सरकार की पदोन्नति में आरक्षण नीति को बाद में न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इसके बाद मुलायम सिंह यादव सरकार ने न केवल नीति समाप्त की, बल्कि पदोन्नत कर्मचारियों की वरिष्ठता भी रोक दी।
मध्यप्रदेश में भी नई पदोन्नति नीति न्यायालय में चुनौती के अधीन है। इसके बावजूद मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री की पहल पर विधिक राय लेकर, बिना स्थगन आदेश की स्थिति में पदोन्नति प्रक्रिया शुरू की गई है।
पदोन्नति में आरक्षण को लेकर कई राज्यों में कानूनी विवाद जारी हैं। उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों का स्पष्ट मत है कि इसके लिए सरकारों के पास ठोस डाटाबेस होना चाहिए, जिससे यह प्रमाणित हो सके कि संबंधित वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। अब तक कोई भी राज्य सरकार ऐसा डाटाबेस प्रस्तुत नहीं कर सकी है।
आरक्षण एक संवैधानिक व्यवस्था है, राजनीतिक हथियार नहीं। सरकारों को समयबद्ध पदोन्नति सुनिश्चित करने के साथ आवश्यक डाटाबेस भी तैयार करना चाहिए, ताकि कर्मचारियों को वर्षों तक अनिश्चितता का सामना न करना पड़े। फिलहाल पदोन्नतियां शुरू तो हो गई हैं, लेकिन अंतिम राहत अब भी न्यायालय के अंतिम फैसले पर निर्भर है।












