भोपाल, 25 जुलाई।
पूरे विश्व में मजाक बन चुका यह ओवरब्रिज आज सरकारी सिस्टम की सबसे बड़ी नाकामी का सबूत है। 18 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए, पर नतीजा निकला एक ऐसा पुल, जिस पर न गाड़ी सुरक्षित चल सकती है और न ही उसका उद्देश्य पूरा हो सकता है। राज्य सरकार सो रही है, रेलवे चुप है और दोनों मिलकर सिर्फ एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। शहर के बीचों-बीच बना यह पुल तकनीकी रूप से पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है। कारण है इसका 90 डिग्री का मोड़। सीधी सड़क पर चलती गाड़ी अचानक 90 डिग्री घूमेगी। मतलब पुल बना ही इस तरह है कि उसका उपयोग व्यावहारिक नहीं रह गया। लोग पूछ रहे हैं कि क्या भारत में इंजीनियरिंग इसी स्तर की है, पर यहां के अधिकारियों को कोई फर्क नहीं पड़ा। न शर्म आई, न जवाबदेही तय हुई।
सरकारी कागजों के अनुसार इस पुल पर 18 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। 18 करोड़ का मतलब समझते हैं? सैकड़ों स्कूल बन सकते थे, सैकड़ों अस्पताल बन सकते थे, हजारों गरीबों को रोजगार मिल सकता था। पर पैसा गया एक ऐसे प्रोजेक्ट में, जो आज तक शुरू ही नहीं हुआ। पुल बनकर तैयार है, पर ताला लगा है क्योंकि डिजाइन में ही गड़बड़ी है। अब अधिकारी कह रहे हैं कि डिजाइन पास करते समय गलती हो गई, नक्शा ठीक से नहीं देखा गया और तकनीकी जांच नहीं हुई।
18 करोड़ का प्रोजेक्ट बिना जांच के कैसे पास हुआ? किसने हस्ताक्षर किए? किसने मंजूरी दी? उस इंजीनियर पर क्या कार्रवाई हुई? उस अधिकारी पर क्या कार्रवाई हुई? जवाब है—कुछ नहीं। सब अपनी कुर्सी पर बैठे हैं और जनता का पैसा डूब गया।
जैसे ही पुल की खामी सामने आई, दोनों विभाग आमने-सामने आ गए। राज्य सरकार कहती है कि यह रेलवे का प्रोजेक्ट था। रेलवे कहता है कि नक्शा राज्य सरकार ने पास किया था। मीटिंग होती है, फोटो खिंचती है और फाइल बंद हो जाती है। इधर जनता 18 करोड़ के नुकसान का बोझ ढो रही है। किसी ने इस्तीफा नहीं दिया, किसी ने माफी नहीं मांगी। बस प्रेस कॉन्फ्रेंस में कह दिया गया कि सुधार किया जाएगा।
अब नया फरमान आया है कि पुल के पास 2.5 मीटर अतिरिक्त जगह लेकर मोड़ को चौड़ा किया जाएगा। मतलब फिर से टेंडर, फिर से पैसा, फिर से कमीशन। एक गलती को सुधारने के लिए दूसरी प्रक्रिया शुरू हो गई। इस बीच ठेकेदार से लेकर बाबू तक सब मालामाल। कौन पूछेगा कि पहली बार गलती क्यों हुई? कौन पूछेगा कि दूसरी बार गलती न हो, इसकी गारंटी क्या है?
इस पुल का मकसद था जाम से राहत दिलाना, पर आज जाम वैसे ही है। उल्टा 18 करोड़ का बोझ जनता के सिर पर और चढ़ गया। अगर यह पैसा सड़कों पर लगता तो दर्जनों सड़कें बन जातीं। अगर यह पैसा शिक्षा पर लगता तो हजारों बच्चों का भविष्य बन जाता। पर नहीं, पैसा गया एक ऐसे पुल में, जो धरोहर बनकर रह गया है—देखने की धरोहर, हंसने की धरोहर और शर्म करने की धरोहर।
किसी भी प्रथम वर्ष के इंजीनियरिंग छात्र से पूछ लीजिए, वह बता देगा कि ओवरब्रिज पर 90 डिग्री का मोड़ नहीं दिया जाता। वाहन की गति, मोड़ का रेडियस और सड़क की चौड़ाई जैसी सभी बातों की गणना की जाती है। यहां तो सब नियम ताक पर रख दिए गए और नतीजा सामने है। अब कहा जा रहा है कि तकनीकी समिति बनाई जाएगी, रिपोर्ट आएगी और जांच होगी। पर तब तक अधिकारी सेवानिवृत्त हो जाएंगे और जनता भूल जाएगी।
सबसे खतरनाक बात यह है कि सिस्टम को कोई फर्क ही नहीं पड़ता। मीडिया में खबर चली, सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग हुई, विदेशों तक में चर्चा हुई, लेकिन न कोई जांच, न कोई निलंबन, न कोई एफआईआर। क्योंकि यहां गलती करने वाले सुरक्षित हैं और सवाल पूछने वाले परेशान।
भारत चांद पर पहुंच रहा है। भारत डिजिटल इंडिया की बात कर रहा है। भारत विश्वगुरु बनने का सपना देख रहा है और उसी भारत में 18 करोड़ का पुल 90 डिग्री का मोड़ लेकर खड़ा है। विदेशी लोग पूछते हैं कि क्या आपके यहां इंजीनियर ऐसे ही होते हैं? क्या आपके यहां टैक्स का पैसा ऐसे ही उड़ाया जाता है? इसका जवाब किसके पास है?
अब और बहाने नहीं चलेंगे। अब और समितियां नहीं बनेंगी। तुरंत जिम्मेदार अधिकारियों और इंजीनियरों पर कार्रवाई हो। पुल को या तो तुरंत सुधारकर चालू किया जाए या तोड़कर नया बनाया जाए। 18 करोड़ रुपये की वसूली दोषियों से की जाए। भविष्य में ऐसे प्रोजेक्ट के लिए सख्त नियम बनाए जाएं।
आम आदमी पूछ रहा है कि मेरा टैक्स कहां गया? आम आदमी पूछ रहा है कि मेरे पैसे से बना पुल क्यों नहीं चल रहा? आम आदमी पूछ रहा है कि गलती करने वाले आज भी कुर्सी पर क्यों हैं? अगर इन सवालों का जवाब नहीं है, तो फिर किस बात का लोकतंत्र, किस बात का विकास?
यह पुल एक पुल नहीं है, यह हमारे सिस्टम की लाश है। यह बताता है कि कैसे बिना योजना के काम होते हैं, कैसे बिना जवाबदेही के पैसा बर्बाद किया जाता है और कैसे गलती के बाद भी कोई शर्मिंदा नहीं होता। 18 करोड़ रुपये खर्च करके हमने एक तमाशा खड़ा कर दिया है, जिसे देखकर दुनिया हंसती है और हम चुप रहते हैं। अब और चुप नहीं रहा जाएगा। अब हिसाब देना होगा, क्योंकि जनता का पैसा जनता की अमानत है और अमानत में खयानत करने वालों को सजा मिलनी ही चाहिए। वरना कल फिर कोई 90 डिग्री का पुल बनेगा, फिर 18 करोड़ रुपये डूब जाएंगे और फिर हम ऐसे ही बैठकर अफसोस करेंगे।














