तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले एआईएडीएमके-भाजपा और डीएमके गठबंधनों में सीट बंटवारे को लेकर असंतोष और खींचतान जारी है, जिससे चुनावी रणनीति और क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो सकता है।
तमिलनाडु में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। राज्य की दो प्रमुख द्रविड़ पार्टियां—एआईएडीएमके और डीएमके—अपने-अपने गठबंधनों के साथ सीट बंटवारे को अंतिम रूप देने में जुटी हैं। लेकिन दोनों खेमों में सहयोगी दलों के बीच खींचतान जारी है, जिससे चुनावी समीकरण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाए हैं।
एआईएडीएमके-भाजपा गठबंधन: चार दिन में फैसला?
के. पलानीस्वामी, जो एआईएडीएमके के प्रमुख नेता हैं, ने संकेत दिए हैं कि पार्टी अपने सहयोगी दलों—खासकर भारतीय जनता पार्टी—के साथ सीट बंटवारे का मसला अगले चार दिनों में सुलझा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि बातचीत “मैत्रीपूर्ण” तरीके से चल रही है और सभी दलों के हितों को ध्यान में रखा जाएगा।
भाजपा ने इस बार तमिलनाडु में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए रणनीतिक तैयारी की है। पार्टी कम से कम 30 सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छुक है। खासकर दक्षिणी जिलों—जैसे कन्याकुमारी, कोयंबटूर और चेन्नई—पर उसका विशेष फोकस है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, भाजपा ने करीब 75 संभावित सीटों की पहचान की है, जिनमें से 30–35 सीटों पर समझौता होने की संभावना है।
भाजपा का मानना है कि यदि उसे कम लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीटें मिलती हैं, तो वह अपना “स्ट्राइक रेट” बढ़ा सकती है। यही कारण है कि पार्टी हर सीट पर गहन तैयारी कर रही है और स्थानीय स्तर पर संगठन को मजबूत करने पर जोर दे रही है।
डीएमके गठबंधन में असंतोष
दूसरी ओर, सत्ताधारी डीएमके और उसके सहयोगी दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर तनाव बना हुआ है। मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन इस मुद्दे को सुलझाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं, लेकिन सहयोगी दलों की बढ़ती मांगें उनके लिए चुनौती बनती जा रही हैं।
विशेष रूप से कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) (सीपीआईएम) ने साफ कर दिया है कि वह 2021 में मिली 6 सीटों से कम पर समझौता नहीं करेगी। पार्टी ने यहां तक चेतावनी दी है कि यदि उसकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तो वह अकेले चुनाव लड़ने पर विचार कर सकती है।
इसी तरह, अन्य सहयोगी दल भी अपनी-अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। मरुमलार्ची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एमडीएमके) को दो सीटें देने का प्रस्ताव है, लेकिन वह अपने “टॉर्च लाइट” चुनाव चिन्ह पर ही चुनाव लड़ने की शर्त रख रही है। यह मांग भी बातचीत को जटिल बना रही है।
कांग्रेस की भूमिका और बढ़ती मांगें
डीएमके गठबंधन में इंडियन नेशनल कांग्रेस की भूमिका भी अहम है। कांग्रेस अधिक सीटों की मांग कर रही है, जिससे गठबंधन में असंतोष बढ़ सकता है। यदि कांग्रेस की मांगें पूरी नहीं होतीं, तो इसका असर पूरे गठबंधन की एकजुटता पर पड़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डीएमके के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने सहयोगी दलों को संतुष्ट रखते हुए सीटों का संतुलन बनाना है। यदि यह संतुलन बिगड़ता है, तो विपक्ष को इसका सीधा फायदा मिल सकता है।
दक्षिणी जिलों पर खास नजर
इस चुनाव में दक्षिणी तमिलनाडु विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भाजपा और एआईएडीएमके दोनों ही इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं। कन्याकुमारी जैसे जिलों में भाजपा पहले भी अच्छा प्रदर्शन कर चुकी है और इस बार वह इसे और बेहतर बनाने की कोशिश में है।
कोयंबटूर और चेन्नई जैसे शहरी क्षेत्रों में भी भाजपा अपनी उपस्थिति बढ़ाने की रणनीति बना रही है। इन क्षेत्रों में मध्यम वर्ग और युवा मतदाताओं को आकर्षित करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
नए सहयोगियों की तलाश
एनडीए खेमे में नए दलों को शामिल करने की संभावना पर भी चर्चा हो रही है, लेकिन अभी तक कोई स्पष्ट रणनीति सामने नहीं आई है। एआईएडीएमके और भारतीय जनता पार्टी दोनों ही अपने गठबंधन को मजबूत करने के लिए संभावित सहयोगियों से बातचीत कर रहे हैं।
हालांकि, कुछ दलों के साथ गठबंधन की अटकलें जरूर हैं, लेकिन किसी भी पक्ष ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। यह स्पष्ट है कि चुनाव से पहले गठबंधन की तस्वीर में बदलाव संभव है।
सस्पेंस अभी बरकरार
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले की राजनीति अभी पूरी तरह से खुलकर सामने नहीं आई है। एक ओर एआईएडीएमके-भाजपा गठबंधन सीट बंटवारे को अंतिम रूप देने के करीब है, वहीं दूसरी ओर डीएमके गठबंधन के भीतर असंतोष बढ़ता दिख रहा है।
आने वाले कुछ दिन बेहद महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि इन्हीं दिनों में यह तय होगा कि कौन-सा दल किस सीट पर चुनाव लड़ेगा और किसकी रणनीति कितनी प्रभावी साबित होगी। सीट बंटवारे की यह खींचतान न केवल गठबंधन की मजबूती को परखेगी, बल्कि चुनावी परिणामों पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा।
इस बार का चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि रणनीति, गठबंधन प्रबंधन और क्षेत्रीय संतुलन की परीक्षा भी है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन-सा गठबंधन अपने मतभेदों को सुलझाकर मतदाताओं के सामने मजबूत विकल्प के रूप में उभरता है।