संपादकीय
04 Apr, 2026

भीड़तंत्र का बढ़ता साया और समाज की मौन सहमति

देश में बढ़ती भीड़तंत्र की घटनाएं कानून की उपेक्षा और समाज में असहिष्णु प्रवृत्ति को उजागर कर रही हैं।

नई दिल्ली, 04 अप्रैल।
देश के विभिन्न हिस्सों में भीड़ द्वारा कानून अपने हाथ में लेने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। हालिया घटनाक्रम, जिसमें मोबाइल चोरी के संदेह में एक किशोर की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई, केवल एक अपराध नहीं बल्कि हमारे समाज के भीतर पनप रही खतरनाक मानसिकता का आईना है। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या अब न्याय व्यवस्था पर लोगों का विश्वास इतना कम हो गया है कि वे स्वयं ही सजा देने को तत्पर हो जाते हैं?
ऐसी घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था की विफलता का परिणाम नहीं हैं, बल्कि समाज में बढ़ती असहिष्णुता और त्वरित न्याय की प्रवृत्ति को भी उजागर करती हैं। किसी पर संदेह होना और उसे अपराधी मान लेना, फिर बिना किसी जांच या प्रमाण के सजा देना—यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। इससे न केवल निर्दोष लोगों की जान जाती है, बल्कि कानून के शासन की नींव भी कमजोर होती है।
चिंताजनक बात यह है कि इन घटनाओं के दौरान उपस्थित लोग न केवल मूकदर्शक बने रहते हैं, बल्कि कई बार इस हिंसा का हिस्सा भी बन जाते हैं। भीड़ का मनोविज्ञान व्यक्ति की व्यक्तिगत संवेदनशीलता को दबा देता है, और वह भीड़ के साथ बहने लगता है। यही कारण है कि सामान्य परिस्थितियों में शांत रहने वाला व्यक्ति भीड़ का हिस्सा बनकर हिंसक हो जाता है।
सोशल मीडिया और अफवाहों की भूमिका भी इन घटनाओं में कम नहीं है। बिना सत्यापन के फैलने वाली सूचनाएं लोगों को भड़काती हैं और स्थिति को और अधिक विस्फोटक बना देती हैं। कई बार यह देखा गया है कि महज एक अफवाह के आधार पर लोगों को निशाना बनाया गया और उनकी जान ले ली गई। यह स्थिति न केवल भयावह है, बल्कि समाज के लिए गंभीर खतरे का संकेत भी है।
प्रशासन और पुलिस की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए त्वरित और सख्त कार्रवाई आवश्यक है। दोषियों को शीघ्र दंडित किया जाना चाहिए, ताकि समाज में यह संदेश जाए कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। साथ ही, जागरूकता अभियानों के माध्यम से लोगों को यह समझाना भी जरूरी है कि न्याय का अधिकार केवल न्यायपालिका को है, न कि किसी भीड़ को।
यह समझना होगा कि भीड़तंत्र किसी भी सभ्य समाज के लिए घातक है। यदि इसे समय रहते नहीं रोका गया, तो यह प्रवृत्ति हमारे सामाजिक ताने-बाने को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। हमें अपने भीतर की मानवता को जागृत करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी परिस्थिति में कानून का सम्मान बना रहे। तभी हम एक सुरक्षित और न्यायपूर्ण समाज की कल्पना कर सकते हैं।
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