अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव में सहयोगी देशों की दूरी और कूटनीतिक प्रयास वैश्विक युद्ध की संभावना को कम कर सकते हैं, शांति और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता प्राथमिकता बनती है।
वैश्विक राजनीति में युद्ध और कूटनीति हमेशा एक-दूसरे के समानांतर चलते हैं। हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने एक बार फिर दुनिया को संभावित बड़े संघर्ष की आशंका में डाल दिया है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप को इस मुद्दे पर अपने पारंपरिक सहयोगियों का पूरा समर्थन मिलता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। कई यूरोपीय देशों और सहयोगी राष्ट्रों ने सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से इस युद्ध में शामिल होने से इनकार कर दिया है। इससे यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या अमेरिका इस संघर्ष में वास्तव में अकेला पड़ रहा है और क्या इससे युद्ध की संभावना कम हो सकती है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने सैन्य गठबंधन नाटो को पश्चिमी देशों की सामूहिक सुरक्षा का आधार माना जाता है। सामान्यतः अमेरिका की सैन्य रणनीतियों में नाटो देशों का सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन ईरान के साथ संभावित युद्ध को लेकर कई प्रमुख यूरोपीय देशों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वे सीधे सैन्य कार्रवाई का हिस्सा नहीं बनना चाहते। यूरोप के प्रमुख देश इटली, स्विट्जरलैंड और स्पेन पहले ही संकेत दे चुके हैं कि वे इस संघर्ष में सक्रिय सैन्य भूमिका निभाने के पक्ष में नहीं हैं। इसी प्रकार फ्रांस और जर्मनी ने भी सावधानी भरा रुख अपनाया है। जर्मनी के नेतृत्व ने स्पष्ट कहा कि यह नाटो का युद्ध नहीं है, इसलिए इसमें गठबंधन की सामूहिक भागीदारी आवश्यक नहीं मानी जानी चाहिए। यह रुख इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यूरोप पहले से ही कई आर्थिक और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऊर्जा संकट, महंगाई और क्षेत्रीय तनाव के बीच यूरोपीय देश किसी नए बड़े युद्ध में फंसने से बचना चाहते हैं।
अमेरिका का पारंपरिक सहयोगी यूनाइटेड किंगडम भी इस मामले में पूरी तरह आगे आता नहीं दिख रहा है। ब्रिटिश नेतृत्व ने संकेत दिया है कि वह किसी बड़े युद्ध गठबंधन का हिस्सा बनने में सावधानी बरतेगा। इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रिटेन अमेरिका से दूरी बना रहा है, बल्कि वह स्थिति को कूटनीतिक तरीके से हल करने के पक्ष में अधिक दिखाई देता है। इसी तरह एशिया-प्रशांत क्षेत्र के अमेरिकी सहयोगी जापान और ऑस्ट्रेलिया ने भी सीधे युद्ध में शामिल होने के प्रति उत्साह नहीं दिखाया है। इन देशों के लिए क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता प्राथमिकता है, इसलिए वे किसी बड़े मध्य-पूर्वी संघर्ष में सीधे प्रवेश से बचना चाहते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में चीन ने भी दिलचस्प भूमिका निभाई है। बीजिंग ने कहा है कि पहले युद्ध की स्थिति को रोकने और तनाव कम करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए, उसके बाद ही किसी सैन्य गतिविधि या नौसैनिक तैनाती की बात होनी चाहिए। यह बयान चीन की उस नीति को दर्शाता है, जिसमें वह खुद को वैश्विक शांति और मध्यस्थता की भूमिका में प्रस्तुत करना चाहता है। चीन का यह रुख अमेरिका की रणनीति के लिए चुनौती भी बन सकता है, क्योंकि यदि वैश्विक शक्तियां युद्ध के बजाय वार्ता पर जोर देती हैं तो अमेरिका पर भी दबाव बढ़ सकता है कि वह सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक समाधान तलाशे।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि यदि सहयोगी देश अमेरिका की मदद नहीं करते तो यह नाटो के लिए अच्छा संकेत नहीं होगा। इसे कई विश्लेषक एक तरह की अप्रत्यक्ष चेतावनी या दबाव की रणनीति मानते हैं। ट्रंप पहले भी नाटो देशों से यह कहते रहे हैं कि उन्हें अपनी रक्षा पर अधिक खर्च करना चाहिए और अमेरिका पर निर्भरता कम करनी चाहिए। ऐसे में यदि नाटो देश इस युद्ध में भागीदारी से इनकार करते हैं तो इससे गठबंधन के भीतर राजनीतिक तनाव भी बढ़ सकता है। हालांकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि नाटो एक दीर्घकालिक सुरक्षा ढांचा है और किसी एक संकट के कारण उसका अस्तित्व खतरे में नहीं पड़ेगा। फिर भी इस स्थिति ने गठबंधन के भीतर मतभेदों को जरूर उजागर कर दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम में भारत भी सावधानी के साथ स्थिति पर नजर बनाए हुए है। भारतीय नौसेना के जहाजों की गतिविधियों और समुद्री सुरक्षा के प्रयासों का उद्देश्य मुख्य रूप से व्यापारिक मार्गों और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। मध्य-पूर्व भारत के लिए ऊर्जा और व्यापार का महत्वपूर्ण क्षेत्र है, इसलिए भारत किसी भी प्रकार की अस्थिरता से बचना चाहता है। साथ ही ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक और आर्थिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए भारत की कोशिश यही रहती है कि वह संतुलित कूटनीति अपनाते हुए सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखे।
यदि अधिकांश सहयोगी देश युद्ध में सक्रिय भागीदारी से इनकार करते हैं तो अमेरिका को सैन्य और राजनीतिक दोनों स्तरों पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। बड़े युद्धों में अंतरराष्ट्रीय समर्थन केवल सैन्य संसाधनों के लिए ही नहीं, बल्कि वैधता और वैश्विक समर्थन के लिए भी जरूरी होता है। अतीत में भी कई बार ऐसा हुआ है जब अमेरिका को किसी सैन्य कार्रवाई में सीमित सहयोग मिला। ऐसे मामलों में युद्ध लंबा खिंच सकता है और उसके आर्थिक व राजनीतिक परिणाम अधिक गंभीर हो सकते हैं।
दूसरी ओर, यह भी संभव है कि सहयोगियों की दूरी ही अंततः युद्ध को रोकने में भूमिका निभाए। जब प्रमुख देश सैन्य कार्रवाई से बचने का संदेश देते हैं तो इससे कूटनीतिक बातचीत की संभावना बढ़ जाती है। यदि वैश्विक शक्तियां मिलकर तनाव कम करने और वार्ता का रास्ता अपनाने पर जोर देती हैं, तो यह पूरी दुनिया के लिए सकारात्मक संकेत हो सकता है। मध्य-पूर्व पहले ही कई दशकों से संघर्ष और अस्थिरता का केंद्र रहा है, इसलिए एक और बड़े युद्ध से बचना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्राथमिकता होनी चाहिए।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक राजनीति के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है। लेकिन इस बार कई सहयोगी देशों की सतर्कता और दूरी यह संकेत देती है कि दुनिया शायद एक और बड़े युद्ध से बचना चाहती है। यदि कूटनीति को प्राथमिकता दी जाती है और संवाद के रास्ते खुले रहते हैं, तो संभव है कि यह संकट युद्ध में बदलने से पहले ही शांत हो जाए। आज की वैश्विक व्यवस्था में किसी भी बड़े संघर्ष का प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ता है। इसलिए यह आवश्यक है कि शक्तिशाली राष्ट्र युद्ध के बजाय सहयोग, बातचीत और शांति की दिशा में कदम बढ़ाएं। तभी विश्व वास्तव में स्थिर और सुरक्षित बन सकता है।