पत्रकारवार्ता में फुल्का ने दावा किया कि इतने कम समय में विस्तृत सूचियां तैयार करना संभव नहीं था। उन्होंने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में हिंसा भड़की। मिश्रा आयोग के समक्ष अग्निशमन विभाग के रिकॉर्ड के आधार पर यह बताया गया था कि भीड़ एम्स से निकलकर तीन दिशाओं में फैल गई थी। फुल्का के अनुसार, एक नवंबर की सुबह से पहले ही हिंसा की योजना बनाने के लिए बैठकें हुई थीं।
गुरुद्वारों और घरों पर हमलों का आरोप
फुल्का ने आरोप लगाया कि कई मामलों में पुलिस सिखों को गुरुद्वारों से घर लौटने और सुरक्षा का भरोसा देकर गई, लेकिन इसके बाद गुरुद्वारों को ही आग के हवाले किया गया। फिर सिख परिवारों के घरों पर हमले हुए। उन्होंने दिल्ली के विभिन्न पुलिस थानों में दर्ज प्राथमिकी की भाषा एक जैसी होने का भी दावा किया।
उनके अनुसार, हिंसा के बाद कई क्षेत्रों में मृतकों की संख्या का व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं रखा गया और अनेक मामलों में अलग-अलग प्राथमिकी भी दर्ज नहीं की गईं।
‘यह हिंदू बनाम सिख नहीं, कांग्रेस बनाम सिखों का मामला था’
फुल्का ने कहा कि 1984 की हिंसा को हिंदू बनाम सिख के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस का समर्थन करने वाले लोग हत्याओं में शामिल थे, जबकि भाजपा, कम्युनिस्ट दलों से जुड़े लोगों और राजनीतिक दलों से संबंध नहीं रखने वाले नागरिकों ने सिखों की रक्षा की।
उल्लेखनीय है कि भाजपा दिल्ली के सिख बहुल क्षेत्र हरिनगर में 1 नवंबर को विरोध मार्च निकालने जा रही है। यह मार्च कांग्रेस और इंडी गठबंधन की रामलीला मैदान में प्रस्तावित रैली के विरोध में आयोजित किया जाएगा।
















