20 अप्रैल।
असम और पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता की एक महत्वपूर्ण परीक्षा बनते जा रहे हैं। इन चुनावों के केंद्र में दो प्रमुख मुद्दे उभरकर सामने आए हैं—धार्मिक ध्रुवीकरण की तीव्र होती प्रवृत्ति और चुनावी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता पर उठते सवाल। यदि इन चिंताओं का संतुलित समाधान नहीं हुआ, तो चुनावी प्रक्रिया की वैधता पर ही प्रश्नचिह्न लग सकते हैं।
असम में 2023 में हुए परिसीमन ने चुनावी परिदृश्य को नया आकार दिया है। परिसीमन एक नियमित और आवश्यक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य जनसंख्या के अनुरूप निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन करना होता है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि इस प्रक्रिया ने कुछ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की राजनीतिक प्रभावशीलता को कम कर दिया है। कई स्थानों पर इन क्षेत्रों को विभाजित कर दिया गया, जिससे उनका मत-भार घटा, जबकि अन्य क्षेत्रों में सत्ताधारी दल के समर्थन वाले समूह अधिक संगठित होकर उभरे हैं। प्रथम-पास-पोस्ट प्रणाली में ऐसे बदलावों का गहरा असर पड़ता है, क्योंकि यहां कुल वोट प्रतिशत से अधिक महत्व सीटों की संख्या का होता है।
पश्चिम बंगाल में विवाद मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर है। इस प्रक्रिया के बाद मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। आधिकारिक तौर पर इसे दोहराव हटाने की कार्रवाई बताया गया है, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि हटाए गए नामों में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अनुपात से अधिक है। इसने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं और विपक्ष तथा आयोग के बीच भरोसे की खाई को और गहरा किया है।
इन दोनों राज्यों में चुनावी राजनीति का चरित्र भी बदलता नजर आ रहा है। एक समय था जब असम की राजनीति भाषा और क्षेत्रीय पहचान के इर्द-गिर्द केंद्रित थी, जबकि पश्चिम बंगाल में वर्ग आधारित राजनीति का प्रभाव था। लेकिन पिछले वर्षों में राजनीतिक रणनीतियों ने धार्मिक पहचान को प्रमुख चुनावी मुद्दा बना दिया है। नतीजतन, मतदाताओं का स्पष्ट ध्रुवीकरण देखने को मिल रहा है, जहां विभिन्न समुदाय संगठित रूप से मतदान व्यवहार प्रदर्शित कर रहे हैं।
हालांकि यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि चुनाव परिणाम पहले से तय हैं, लेकिन यह चिंता वास्तविक है कि यदि चुनावी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता पर जनता का विश्वास कमजोर पड़ता है, तो लोकतंत्र की नींव भी हिल सकती है। चुनाव केवल वोट डालने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया में जनता के भरोसे का प्रतीक होते हैं।
ऐसे समय में चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें न केवल निष्पक्ष रहना चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखना भी उतना ही आवश्यक है। लोकतंत्र की असली शक्ति उसकी पारदर्शिता और स्वीकार्यता में निहित होती है, न कि केवल कानूनी औपचारिकताओं में।
यदि चुनाव के नियमों पर ही विवाद खड़े होने लगें, तो प्रतिस्पर्धा का अर्थ बदल जाता है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर पड़ती है। इसलिए सभी राजनीतिक दलों और संस्थाओं को जिम्मेदारी और संतुलन के साथ कार्य करना होगा, ताकि लोकतंत्र की साख बनी रहे और जनता का विश्वास अडिग रह सके।