संपादकीय
20 Apr, 2026

चौराहों से गायब प्याऊ क्या प्रशासन को आमजन की प्यास दिखाई नहीं देती

भीषण गर्मी के बीच शहर के प्रमुख चौराहों से प्याऊ व्यवस्था के गायब होने से जल संकट गहराया है, जिससे प्रशासन की कार्यप्रणाली और जनसुविधाओं पर गंभीर प्रश्न उठे हैं।

20 अप्रैल।
भीषण गर्मी ने एक बार फिर अपनी दस्तक दे दी है। तापमान लगातार बढ़ रहा है और लू के थपेड़े आमजन के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। ऐसे में सरकार द्वारा स्कूलों के समय में बदलाव करना निश्चित रूप से एक सराहनीय कदम है, जिससे बच्चों को राहत मिल सके। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ स्कूलों का समय बदल देने से ही जनता की समस्याओं का समाधान हो जाएगा? क्या प्रशासन की जिम्मेदारी केवल कागजों तक सीमित रह गई है?
वर्षों से नगर निगम द्वारा शहर के प्रमुख चौराहों, बस स्टैंडों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में प्याऊ (मुफ्त पानी की व्यवस्था) लगाई जाती रही है। यह न केवल एक परंपरा थी, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता और जनकल्याण का प्रतीक भी थी। राहगीरों, रिक्शा चालकों, मजदूरों और आम नागरिकों के लिए यह प्याऊ किसी जीवनदायिनी से कम नहीं थे। लेकिन इस बार स्थिति चिंताजनक है। शहर के अधिकांश चौराहों से ये प्याऊ गायब हैं। यह अनुपस्थिति केवल एक सुविधा की कमी नहीं है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और असंवेदनशीलता का स्पष्ट उदाहरण है। जब तापमान 42 डिग्री के पार जा रहा हो, तब पीने के पानी जैसी बुनियादी आवश्यकता की अनदेखी करना सीधे तौर पर जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
नगर निगम का दायित्व केवल टैक्स वसूलने तक सीमित नहीं होना चाहिए। जनहित की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। लेकिन वर्तमान हालात यह दर्शाते हैं कि प्रशासनिक तंत्र अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रहा है। योजनाएं बनती हैं, घोषणाएं होती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका क्रियान्वयन नदारद है। समय की मांग है कि प्रशासन तत्काल सक्रिय होकर प्याऊ की व्यवस्था सुनिश्चित करे और उसकी नियमित निगरानी भी करे, ताकि यह केवल दिखावा बनकर न रह जाए।
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