मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था में एसी कमरों और अस्पताल वार्डों के बीच बढ़ती खाई से मरीजों की स्थिति बिगड़ी, गर्मी में उपचार व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल उठे।
20 अप्रैल।
मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था की जो तस्वीर आज सामने आ रही है, वह किसी भी संवेदनशील समाज के लिए शर्मनाक और चिंताजनक है। एक ओर जहां सत्ता और प्रशासन के गलियारों में बैठे अधिकारी और नेता 22-24 डिग्री के ठंडे कमरों में आराम फरमा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकारी अस्पतालों के वार्डों में मरीज 41-45 डिग्री की भीषण गर्मी में झुलसने को मजबूर हैं। यह केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि एक तरह की संवेदनहीनता है, जो सीधे-सीधे आम आदमी के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रही है।
पिछले कुछ दिनों में प्रदेश के कई सरकारी अस्पतालों, विशेषकर सीहोर, रायसेन, राजगढ़, विदिशा और होशंगाबाद जिलों से जो शिकायतें सामने आई हैं, वे बेहद भयावह हैं। बर्न यूनिट जैसे संवेदनशील वार्ड, जहां मरीजों को विशेष देखभाल और नियंत्रित तापमान की आवश्यकता होती है, वहां भी पंखों से निकलती गर्म हवा मरीजों के घावों पर नमक छिड़कने का काम कर रही है। सामान्य वार्डों की हालत भी इससे अलग नहीं है। मरीज इलाज लेने आता है, लेकिन यहां उसे राहत नहीं, बल्कि एक नई सजा मिलती है।
कभी यही सरकारी अस्पताल मार्च महीने से ही गर्मी की तैयारी शुरू कर देते थे। कूलर लगाए जाते थे, पानी की समुचित व्यवस्था होती थी, पंखों की मरम्मत और एसी की सर्विसिंग की जाती थी। यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया थी, जो अब बीते समय की बात लगने लगी है। आज हालात यह हैं कि ये बुनियादी सुविधाएं केवल सीएमएचओ, ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर या वरिष्ठ डॉक्टरों के चेंबर तक सीमित रह गई हैं। आम मरीज के हिस्से में आता है सिर्फ पसीना, परेशानी और उपेक्षा।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं? क्या अब मरीजों की सुविधा और जीवन की रक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण अधिकारियों का आराम हो गया है? अगर एक गंभीर मरीज को सिर्फ इसलिए दूसरे अस्पताल रेफर करना पड़ रहा है क्योंकि यहां गर्मी से उसकी हालत और बिगड़ सकती है, तो यह सिर्फ सिस्टम की नाकामी नहीं, बल्कि एक आपराधिक लापरवाही है।
स्वास्थ्य मंत्री और विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को यह समझना होगा कि अस्पताल केवल इमारत नहीं होते, वे जीवन बचाने की जगह होते हैं। वहां का वातावरण मरीज के उपचार का हिस्सा होता है। जब वही वातावरण असहनीय हो जाए, तो इलाज का पूरा तंत्र ही विफल हो जाता है। क्या कभी किसी मंत्री या अधिकारी ने बिना सूचना के इन अस्पतालों का दौरा किया है? क्या उन्होंने उन वार्डों में कुछ समय बिताया है, जहां मरीज दिन-रात इस तपती गर्मी में जूझ रहे हैं?
यह विडंबना ही है कि जिन लोगों के हाथों में व्यवस्था सुधारने की जिम्मेदारी है, वे ही इस हकीकत से सबसे ज्यादा दूर हैं। उनके लिए अस्पतालों की स्थिति फाइलों और रिपोर्टों तक सीमित है, जहां सब “संतोषजनक” दिखता है। लेकिन जमीन पर सच्चाई कुछ और ही है—वह है तड़पते मरीज, परेशान परिजन और लाचार डॉक्टर।
अब समय आ गया है कि प्रशासन इस मुद्दे को गंभीरता से ले। यह कोई विलासिता की मांग नहीं है, बल्कि न्यूनतम मानवीय आवश्यकता है। हर वार्ड में कूलर, पंखों की सही व्यवस्था, साफ पानी और जरूरी उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि यह भी नहीं हो पा रहा, तो फिर बड़े-बड़े दावों और योजनाओं का क्या अर्थ रह जाता है? आखिरकार सवाल केवल सुविधाओं का नहीं, बल्कि सोच का है।
जब तक सत्ता में बैठे लोग खुद को आम जनता की पीड़ा से जोड़कर नहीं देखेंगे, तब तक ऐसी स्थितियां बदलने वाली नहीं हैं। एसी कमरों में बैठकर लिए गए फैसले कभी भी उन तपते वार्डों की सच्चाई को नहीं समझ सकते, जहां हर सांस एक संघर्ष बन चुकी है।
अगर अब भी ध्यान नहीं दिया गया, तो यह गर्मी केवल मौसम की नहीं रहेगी, यह व्यवस्था की विफलता की तपिश बनकर पूरे समाज को झुलसाएगी।