संपादकीय
24 Mar, 2026

ब्रिक्स की ‘खामोशी’ या दुनिया की बदलती कूटनीति?

ब्रिक्स संगठन ने ईरान संकट पर अलग-अलग रुख अपनाया, लेकिन यह कमजोरी नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय आर्थिक और संवाद-आधारित संरचना का परिचायक है।

28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद वैश्विक राजनीति में एक बार फिर ब्रिक्स की भूमिका पर सवाल उठने लगे। कई विश्लेषकों ने इसे ब्रिक्स की विफलता करार दिया, यह कहते हुए कि संगठन एकजुट प्रतिक्रिया देने में असफल रहा। लेकिन क्या वास्तव में यह निष्कर्ष सही है, या हम ब्रिक्स को गलत नजरिए से देख रहे हैं?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ब्रिक्स कोई सैन्य गठबंधन नहीं है। यह नाटो जैसे सुरक्षा-आधारित संगठन की तरह नहीं बना, बल्कि इसका उद्देश्य आर्थिक सहयोग, विकास और वैश्विक वित्तीय ढांचे में संतुलन लाना है। ऐसे में किसी सैन्य संकट पर इसकी एकजुट प्रतिक्रिया की अपेक्षा करना मूलभूत रूप से गलत धारणा है।
वर्तमान घटनाक्रम में ब्रिक्स के भीतर मतभेद स्पष्ट रूप से सामने आए। चीन और ब्राज़ील ने अमेरिकी हमले की आलोचना की, जबकि भारत ने संयमित मौन बनाए रखा और दक्षिण अफ्रीका ने भी कोई स्पष्ट पक्ष नहीं लिया। आलोचकों के लिए यह असंगति संगठन की कमजोरी है, लेकिन वास्तव में यह इसकी प्रकृति का हिस्सा है। ब्रिक्स विविध राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक हितों वाले देशों का समूह है, जिनकी प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।
2009 में स्थापना के बाद से ही ब्रिक्स के सदस्य देशों के दृष्टिकोण में अंतर रहा है। रूस और चीन जहां इसे पश्चिमी देशों के प्रभाव के विकल्प के रूप में देखते हैं, वहीं भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ की नीति पर चलते हैं। 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और यूएई के शामिल होने से यह विविधता और बढ़ गई है। ऐसे में एकरूपता की अपेक्षा करना यथार्थ से परे है।
वास्तव में, ब्रिक्स का मुख्य उद्देश्य तीन प्रमुख क्षेत्रों में केंद्रित है—आर्थिक स्वायत्तता, वैकल्पिक वित्तीय संस्थानों का निर्माण और एक ऐसा मंच उपलब्ध कराना जहां उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपनी शर्तों पर संवाद कर सकें। नई डेवलपमेंट बैंक और डॉलर पर निर्भरता कम करने के प्रयास इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि केवल ब्रिक्स ही मतभेदों से जूझ नहीं रहा। नाटो और जी-7 जैसे पश्चिमी गुटों में भी ईरान मुद्दे पर विभाजन देखने को मिला है। स्पेन और जर्मनी जैसे देशों ने अमेरिका के रुख से असहमति जताई है। इतिहास भी बताता है कि 2003 के इराक युद्ध के समय फ्रांस और जर्मनी ने अमेरिका का विरोध किया था। ऐसे में मतभेद किसी भी बहुपक्षीय संगठन का स्वाभाविक हिस्सा हैं, न कि उसकी विफलता का प्रमाण।
आज की दुनिया स्थायी गठबंधनों से अधिक ‘ट्रांजेक्शनल’ संबंधों की ओर बढ़ रही है, जहां देश अपने तात्कालिक हितों के आधार पर निर्णय लेते हैं। ईरान संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक राजनीति अब अधिक जटिल और बहुध्रुवीय हो चुकी है।
इस परिप्रेक्ष्य में ब्रिक्स को एक सैन्य या राजनीतिक ब्लॉक के बजाय एक ‘डिप्लोमैटिक स्पेस’ के रूप में समझना अधिक उचित होगा। यह ऐसा मंच है जहां सदस्य देश अपने साझा हितों पर सहयोग करते हैं और मतभेदों के बावजूद संवाद बनाए रखते हैं।
अंततः, ब्रिक्स की ‘खामोशी’ उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी संरचना और उद्देश्य का प्रतिबिंब है। इसे उसी नजरिए से परखना होगा, जिसके लिए इसे बनाया गया था—एक संतुलित, बहुध्रुवीय और संवाद-आधारित विश्व व्यवस्था की दिशा में कदम।
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