16 मई।
मध्य प्रदेश में पटाखा फैक्ट्री अब उद्योग नहीं, बल्कि मौत का कारोबार बनती जा रही हैं। हरदा से देवास, बैतूल से उदय नगर तक जहां भी बारूद फटा, वहां मजदूरों की लाशें बिछीं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन हादसों के बाद कार्रवाई क्या हुई? जवाब लगभग हर बार एक ही रहा — जांच, बयान और फिर खामोशी।
फरवरी 2024 में हरदा की अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए विस्फोट में 11 लोगों की मौत हुई और 200 से अधिक लोग घायल हुए। पूरे शहर में तबाही का मंजर था। सरकार ने कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया, जांच बैठी, अधिकारी निलंबित हुए, फैक्ट्री मालिक गिरफ्तार हुआ, लेकिन महीनों बाद भी मामला ठंडे बस्ते में है। न विभागीय जिम्मेदारी तय हुई और न राजनीतिक संरक्षण देने वालों के नाम सामने आए।
देवास और बैतूल में भी वही कहानी दोहराई गई। मई 2026 में देवास के टोंककलां में विस्फोट हुआ, जबकि बैतूल के उदय नगर में अवैध विस्फोटक सामग्री पकड़ी गई। हर बार “कड़ी कार्रवाई” का बयान आया, लेकिन यह कभी स्पष्ट नहीं हुआ कि इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक पहुंचा कैसे और किसकी मिलीभगत से यह कारोबार चलता रहा।
सबसे दुखद यह है कि हादसों में मरने वाले अधिकांश मजदूर गरीब परिवारों से होते हैं। सरकार मुआवजा देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती है, जबकि असली जरूरत जवाबदेही तय करने की है। जिस अधिकारी ने लाइसेंस दिया, निरीक्षण नहीं किया या आंखें मूंदी, उस पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।
विस्फोटक अधिनियम और फैक्ट्री कानून मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन कराने की इच्छाशक्ति दिखाई नहीं देती। अगर अब भी सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो ऐसे हादसे रुकने वाले नहीं हैं। मजदूरों की जिंदगी को “दुर्भाग्य” कहकर भुलाना बंद करना होगा।