31 मार्च
देश में विकास और आधुनिकता की बात बड़े जोर-शोर से होती है, लेकिन उसी विकास की नींव रखने वाले गरीब और वंचित मज़दूरों की ज़िंदगी आज भी सस्ती मानी जाती है। हाल ही में सामने आए आंकड़े इस कड़वी सच्चाई को उजागर करते हैं कि वर्ष 2017 से 2026 के बीच देशभर में 622 सफाईकर्मियों की मौत गटर और सेप्टिक टैंक साफ करते समय हुई। यह सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि 622 परिवारों के उजड़ने की कहानी है।
सबसे दुखद पहलू यह है कि इन मौतों की न तो राजनीति में गंभीर चर्चा होती है और न ही मीडिया में इन्हें वह स्थान मिलता है जिसके वे हकदार हैं। जब कोई चर्चित चेहरा किसी हादसे का शिकार होता है, तो पूरा देश न्याय की मांग में एकजुट हो जाता है। लेकिन जब कोई गरीब मज़दूर गटर में दम घुटने से मर जाता है, तो यह खबर अक्सर अखबार के किसी कोने में सिमट जाती है।
यह स्थिति केवल सरकारी उदासीनता का परिणाम नहीं है, बल्कि समाज की संवेदनहीनता को भी दर्शाती है। गटर और सेप्टिक टैंक की सफाई जैसे खतरनाक कार्य आज भी बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के कराए जा रहे हैं। मज़दूरों को न तो उचित प्रशिक्षण मिलता है और न ही सुरक्षा की गारंटी। परिणामस्वरूप, हर वर्ष सैकड़ों लोग अपनी जान गंवा देते हैं।
और भी चिंताजनक यह है कि इन मौतों के बाद पीड़ित परिवारों को समय पर मुआवजा तक नहीं मिलता। न्याय की प्रक्रिया इतनी धीमी और जटिल है कि कई परिवार वर्षों तक भटकते रहते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या गरीब होना इस देश में अभिशाप है? क्या किसी की जान की कीमत उसकी आर्थिक स्थिति से तय की जानी चाहिए?
मीडिया की भूमिका भी यहां सवालों के घेरे में है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जहां छोटी-छोटी बातों को “ब्रेकिंग न्यूज” बनाकर प्रस्तुत करता है, वहीं ऐसी गंभीर घटनाओं को नजरअंदाज कर देता है। इससे समाज में एक गलत संदेश जाता है कि गरीबों की मौत कोई बड़ी खबर नहीं है।
अब समय आ गया है कि इस मानसिकता में बदलाव लाया जाए। सरकार को चाहिए कि वह सफाईकर्मियों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून लागू करे और उनका कड़ाई से पालन सुनिश्चित करे। साथ ही, हर मौत की निष्पक्ष जांच हो और पीड़ित परिवारों को तत्काल सहायता प्रदान की जाए।
समाज और मीडिया को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। हर जीवन समान रूप से महत्वपूर्ण है—चाहे वह किसी सेलिब्रिटी का हो या एक सामान्य मज़दूर का। जब तक हम इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक ऐसे हादसे यूं ही होते रहेंगे और गरीबों की जान यूं ही जाती रहेगी।











