भोपाल, 4 अप्रैल 2026।
मध्यप्रदेश में न्याय व्यवस्था पर बढ़ता दबाव अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया है। प्रदेश की अदालतों में वर्तमान में करीब 20.96 लाख मामले लंबित हैं, जिनमें कई दशकों से फैसले की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मध्य प्रदेश में एक मामला वर्ष 1954 से लंबित है, यानी लगभग 72 साल बीत जाने के बाद भी इसमें अंतिम फैसला नहीं हो सका। यह स्थिति न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति और बढ़ते मामलों के दबाव को उजागर करती है।
जानकारी के अनुसार, लंबित मामलों में दीवानी और आपराधिक दोनों तरह के केस शामिल हैं। लगातार बढ़ती जनसंख्या, नए मामलों की वृद्धि और न्यायालयों में जजों और संसाधनों की कमी इसके प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर न्याय न मिलना न्याय न मिलने के समान है। लंबे समय तक मामलों का लंबित रहना आम नागरिकों के भरोसे को प्रभावित करता है और न्याय व्यवस्था पर विश्वास कमजोर करता है।
न्यायालयों में मामलों के त्वरित निपटारे के लिए समय-समय पर विशेष अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन लंबित मामलों की संख्या में अपेक्षित कमी नहीं आ पा रही है।
कानूनी जानकारों का सुझाव है कि न्यायिक ढांचे को मजबूत करना, नए न्यायाधीशों की नियुक्ति, डिजिटल सुनवाई को बढ़ावा देना और प्रक्रियाओं को सरल बनाना जरूरी है, ताकि आम नागरिकों को समय पर न्याय मिल सके।
ये आंकड़े स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि प्रदेश की न्याय व्यवस्था को और अधिक सक्षम और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है, ताकि ‘तारीख पर तारीख’ की स्थिति से राहत मिल सके।












