संपादकीय
26 May, 2026

जनजातीय सांस्कृतिक समागम : अस्मिता, आस्था और अस्तित्व का राष्ट्रीय उद्घोष

भारत में जनजातीय समाज की सांस्कृतिक विरासत, बिरसा मुंडा जयंती पर लाल किले में हुए “जनजातीय सांस्कृतिक समागम” और उनकी परंपराओं, संघर्ष, अस्मिता एवं राष्ट्रीय एकता के योगदान का भव्य प्रदर्शन किया गया।

नई दिल्ली, 24 मई।

भारत की सांस्कृतिक आत्मा और शक्ति उन समुदायों में जीवित है, जिन्होंने हजारों वर्षों से प्रकृति, परंपरा और सामुदायिक जीवन के संतुलन को अपने आचरण में संजोकर रखा है। यह समुदाय भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं के निर्माण तथा संवहन का आदि स्वरूप है। 24 मई को इस सनातन संस्कृति का विराट संगम राजधानी दिल्ली के लाल किला परिसर में “जनजातीय सांस्कृतिक समागम” के रूप में संपन्न हुआ। यह आयोजन भारतीय सभ्यता की मूल चेतना के पुनर्जागरण का राष्ट्रीय उद्घोष बन गया। भव्य शोभा यात्राओं और विशाल जनसभा ने जनजातीय संस्कृति, परंपरा और गौरव का ऐसा दृश्य प्रस्तुत किया, जिससे समूचा देश अभिभूत दिखाई दिया। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जन्मजयंती के अवसर पर आयोजित यह महाआयोजन जनजातीय चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता का विराट उत्सव बन गया।

देश के सभी राज्यों से आने वाली सैकड़ों जनजातियों के लाखों प्रतिनिधियों का एक मंच पर एकत्र होना अपने आप में विलक्षण अवसर है। यह समागम उस भारत का प्रतिनिधित्व करता है, जिसने सदियों तक जल, जंगल और जमीन के साथ सह-अस्तित्व की जीवन पद्धति को अपनाया और प्रकृति को पूज्य मानकर जीवन जिया। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट और सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन से जूझ रही है, तब भारतीय जनजातीय समाज का जीवन दर्शन वैश्विक मानवता के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करता है।

जनजातीय समाज भारत की प्राचीन स्मृतियों, लोकज्ञान और सामुदायिक सभ्यता का जीवंत प्रतिनिधि है। प्रकृति पूजा, पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, लोकदेवताओं की आराधना और सामूहिक जीवन की परंपरा उनकी सांस्कृतिक संरचना का मूल आधार रही है। रामायण में शबरी की भक्ति, निषादराज की आत्मीयता और महाभारत में एकलव्य का समर्पण यह स्पष्ट करते हैं कि जनजातीय समाज भारतीय सांस्कृतिक धारा का अभिन्न अंग है।

भारत की संस्कृति, स्वाभिमान और स्वायत्तता के लिए जनजातियों ने अभूतपूर्व संघर्ष किया और बलिदान भी दिए। विदेशी आक्रांताओं के विरोध में सबसे पहले शस्त्र उठाने वालों में जनजातीय वीर अग्रणी रहे। भारत में स्वाधीनता का अंकुर स्वतंत्रता-प्रिय जनजातियों के बीच ही अंकुरित हुआ। बिरसा मुंडा, सिद्धो-कान्हू, रानी दुर्गावती, टंट्या मामा, राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह जैसे असंख्य जननायकों ने स्वाधीनता चेतना को जन-जन तक पहुंचाया। अंग्रेजों ने दमन के लिए शिक्षा और सेवा के नाम पर परिवर्तन का अभियान चलाया तथा जनजातीय समाज को अपराधी घोषित करने का षड्यंत्र रचा। तमाम दबावों और अतिरेकों के बीच भी जनजातीय समाज ने अपने अस्तित्व को बचाए रखा।

एक सामाजिक विसंगति यह भी रही कि लंबे समय तक मुख्यधारा के विमर्श में जनजातीय समाज को केवल पिछड़ेपन, गरीबी या विकास की समस्या के रूप में प्रस्तुत किया गया। बदलते परिदृश्य में चुनौतियों से जूझते जनजातीय समाज का सामाजिक संतुलन भी प्रभावित हुआ है। वैश्वीकरण नई संभावनाओं के साथ सांस्कृतिक विघटन का संकट भी लेकर आया है। पारंपरिक भाषाएँ, लोकगीत, अनुष्ठान और सामुदायिक मूल्य धीरे-धीरे कमजोर होते दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि आज “आस्था”, “अस्मिता” और “अस्तित्व” जनजातीय विमर्श के केंद्रीय विषय बन गए हैं।

इस परिप्रेक्ष्य में “जनजातीय सांस्कृतिक समागम” अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह आयोजन केवल लोकनृत्य, वेशभूषा और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का मंचन मात्र नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने के संकल्प और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की सार्वजनिक अभिव्यक्ति है। जनजातीय समाज अब अपनी संस्कृति, परंपराओं और जीवन दर्शन की रक्षा के लिए संगठित रूप से आगे बढ़ रहा है।

इस समागम में देशभर से आए जनजातीय समुदायों ने अपने पारंपरिक नृत्य, वाद्ययंत्र, लोकगीत, धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक प्रतीकों का प्रदर्शन किया। यह जनजातीय समाज की जीवंत सभ्यता और संस्कृति की प्रस्तुति थी। वास्तव में जनजातीय जीवन पद्धति यह सिखाती है कि आधुनिक विकास और सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन संभव है।

तेलंगाना के आदिलाबाद स्थित नागोबा जत्रा जैसी परंपराएँ इसी सांस्कृतिक निरंतरता की मिसाल हैं। गोंड समाज का यह पवित्र आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता, सामाजिक समन्वय और सांस्कृतिक अनुशासन का महोत्सव है। पवित्र जल यात्रा, महापूजा, नई बहुओं का ‘भेंटिग’ संस्कार, गुसाड़ी नृत्य और सामूहिक भागीदारी यह दर्शाती है कि जनजातीय परंपरा जीवन का आधार है।

मूल बात यह है कि जनजातीय समाज के लिए संस्कृति ही सामाजिक संरचना की आत्मा है। जब पारंपरिक व्यवस्थाएँ कमजोर होती हैं, तो उसका प्रभाव परिवार, समुदाय और सामाजिक संतुलन पर भी पड़ता है। इसलिए विकास योजनाएँ भी जनजातीय समाज की सांस्कृतिक संवेदनशीलताओं का सम्मान करती दिखाई पड़ रही हैं। संविधान की पाँचवीं और छठी अनुसूची, पेसा कानून और वनाधिकार कानून भी इसी सोच को स्वीकार करते हैं।

दिल्ली के लाल किले पर संपन्न हुआ यह समागम प्रतीकात्मक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लाल किला केवल ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय अस्मिता और सभ्यतागत निरंतरता का प्रतीक है। ऐसे स्थान पर जनजातीय समाज का विराट समागम यह संदेश देता है कि भारत की राष्ट्रीय चेतना में जनजातीय समुदाय राष्ट्र की मूल सांस्कृतिक धारा का अभिन्न अंग हैं।

आज जब दुनिया अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रही है, तब भारत का जनजातीय समाज अपनी जीवन पद्धति के माध्यम से संकेत करता है कि विकास का अर्थ अपनी जड़ों से कटना नहीं हो सकता। आधुनिकता तभी सार्थक है, जब वह परंपरा, प्रकृति और सांस्कृतिक संतुलन के साथ आगे बढ़े। तभी पुरातन से नूतन संभव है।

“जनजातीय सांस्कृतिक समागम” एक ऐसे राष्ट्रीय उद्घोष का अवसर है, जो भारत की सांस्कृतिक एकात्मता को प्रदर्शित कर रहा है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि विविधता विभाजन नहीं, बल्कि सभ्यतागत शक्ति का आधार बनती है। वनवासी कल्याण आश्रम और जनजातीय सुरक्षा मंच के प्रयास से आयोजित यह समागम निश्चित ही जनजातीय अस्मिता, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय एकात्मता के नए अध्याय के रूप में स्मरण किया जाएगा।

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