संपादकीय
16 Mar, 2026

भूख बनाम बम : भूखी दुनिया और बारूद की बढ़ती बर्बरता

वैश्विक भूख संकट में 31.8 करोड़ लोग असुरक्षित, युद्ध, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक अस्थिरता मुख्य कारण, संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद वितरण और प्राथमिकताएँ विफल।

डॉ. शैलेश शुक्ला
21वीं सदी को अक्सर मानव सभ्यता की वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों का स्वर्णयुग कहा जाता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष अन्वेषण, जैव-प्रौद्योगिकी और वैश्विक व्यापार के विस्तार ने मानवता की क्षमताओं को अभूतपूर्व ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। किंतु इसी समय एक ऐसी त्रासद वास्तविकता भी सामने खड़ी है, जो आधुनिक सभ्यता के नैतिक विवेक को कठघरे में खड़ा करती है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) की हालिया वैश्विक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में लगभग 31.8 करोड़ लोग संकट स्तर की भूख या उससे भी बदतर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। यह संख्या 2019 के स्तर की तुलना में लगभग दोगुनी है। डब्ल्यूएफपी की कार्यकारी निदेशक सिंडी मैककेन ने इस स्थिति को 21वीं सदी के लिए “पूरी तरह अस्वीकार्य” बताया है। जब विज्ञान और संसाधनों के इस युग में भी करोड़ों लोग भोजन के लिए संघर्ष कर रहे हों, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्या संसाधनों की नहीं, बल्कि वैश्विक प्राथमिकताओं और व्यवस्थागत असमानताओं की है।
वास्तविकता यह है कि पृथ्वी पर भोजन का उत्पादन आज इतना है कि वह दुनिया की पूरी आबादी का पेट भर सकता है। संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि संस्था (एफएओ) और अन्य अंतरराष्ट्रीय आकलनों के अनुसार वैश्विक कृषि प्रणाली 8 अरब से अधिक लोगों के लिए पर्याप्त खाद्य उत्पादन करने में सक्षम है। फिर भी करोड़ों लोग भूख का सामना कर रहे हैं। इसका कारण प्राकृतिक कमी नहीं, बल्कि वितरण की असमानता, संघर्ष, आर्थिक अस्थिरता और राजनीतिक विफलता है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट “द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड” यह स्पष्ट करती है कि वैश्विक भूख के पीछे प्रमुख कारण सशस्त्र संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, आर्थिक संकट और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान हैं। डब्ल्यूएफपी के विश्लेषण के अनुसार तीव्र खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे लोगों में से लगभग 70 प्रतिशत ऐसे देशों में रहते हैं, जो संघर्षग्रस्त या राजनीतिक रूप से अस्थिर हैं। इससे स्पष्ट है कि भूख और युद्ध का संबंध अत्यंत गहरा और प्रत्यक्ष है।
आज वैश्विक भूख के मानचित्र पर सूडान एक ऐसे देश के रूप में उभर कर सामने आया है, जहाँ मानवीय संकट भयावह रूप ले चुका है। अप्रैल 2023 से जारी हिंसक संघर्ष ने वहाँ की सामाजिक और आर्थिक संरचना को लगभग ध्वस्त कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र और डब्ल्यूएफपी के अनुसार लगभग 2.5 करोड़ लोगों को तत्काल खाद्य सहायता की आवश्यकता है। पाँच वर्ष से कम आयु के लगभग 32 लाख बच्चे तीव्र कुपोषण के जोखिम में हैं और इनमें से लगभग 7.7 लाख बच्चे गंभीर तीव्र कुपोषण का सामना कर सकते हैं। दिसंबर 2024 में अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विश्लेषण प्रणाली ‘इंटीग्रेटेड फूड सिक्योरिटी फेज क्लासिफिकेशन’ (आईपीसी) ने सूडान के कई क्षेत्रों में अकाल की घोषणा की। सूडान में महिलाओं और बच्चों की स्थिति विशेष रूप से दयनीय है। संयुक्त राष्ट्र के आकलनों के अनुसार संघर्ष शुरू होने के बाद से लगभग 73 प्रतिशत महिलाओं को पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है और लगभग 98 लाख लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हो चुके हैं।
पश्चिम एशिया में गाज़ा पट्टी का संकट भी भूख और युद्ध के संबंध का एक दर्दनाक उदाहरण प्रस्तुत करता है। लंबे समय से जारी सैन्य संघर्ष ने वहाँ की कृषि और खाद्य आपूर्ति प्रणाली को लगभग नष्ट कर दिया है। मानवीय एजेंसियों के आकलनों के अनुसार गाज़ा की लगभग 86 प्रतिशत कृषि भूमि नष्ट या क्षतिग्रस्त हो चुकी है। बड़ी आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहने को विवश है, जहाँ लगातार सैन्य कार्रवाई या विस्थापन के आदेश लागू हैं। संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के अनुमान बताते हैं कि 2026 तक गाज़ा में एक लाख से अधिक बच्चे तीव्र कुपोषण के खतरे में हो सकते हैं। युद्ध का सबसे भीषण प्रभाव सैनिकों पर नहीं, बल्कि नागरिकों पर पड़ता है। खेतों का नष्ट होना, आपूर्ति मार्गों का बंद होना और बाजार व्यवस्था का टूट जाना लाखों लोगों को सीधे भूख की चपेट में ले आता है।
अफगानिस्तान, यमन, हैती, माली और दक्षिण सूडान जैसे देश भी गंभीर खाद्य संकट का सामना कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों एफएओ और डब्ल्यूएफपी की “हंगर हॉटस्पॉट” रिपोर्ट ने 2025–2026 की अवधि में 16 देशों को ऐसे क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया है, जहाँ खाद्य असुरक्षा तेजी से बढ़ने की आशंका है। इन देशों में संघर्ष, राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट ने खाद्य व्यवस्था को कमजोर कर दिया है। इससे स्पष्ट होता है कि भूख केवल भोजन की कमी का परिणाम नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक, राजनीतिक और पर्यावरणीय संकटों का संयुक्त परिणाम है।
संघर्ष के बाद वैश्विक भूख संकट का दूसरा बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है। लंबे सूखे, विनाशकारी बाढ़, असामान्य तापमान और चक्रवातों की बढ़ती तीव्रता ने अनेक देशों की कृषि प्रणाली को गहराई से प्रभावित किया है। अफ्रीका के साहेल क्षेत्र, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका के कई हिस्सों में बदलते मौसम पैटर्न के कारण फसल उत्पादन अस्थिर हो गया है। जब सूखा या बाढ़ आती है, तो किसानों की फसलें नष्ट हो जाती हैं और उनकी आय समाप्त हो जाती है। परिणामस्वरूप वे स्वयं भी खाद्य असुरक्षा के शिकार बन जाते हैं।
भूख संकट का एक और आयाम वैश्विक आर्थिक अस्थिरता है। विश्व बैंक के अनुसार कई देशों में खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति अभी भी मध्यम से उच्च स्तर पर बनी हुई है। ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और वैश्विक व्यापार की अनिश्चितताओं ने भोजन की लागत को बढ़ा दिया है। तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा प्रभाव कृषि और खाद्य प्रणाली पर पड़ता है, क्योंकि उर्वरकों का उत्पादन, कृषि मशीनरी का संचालन और खाद्यान्न का परिवहन ऊर्जा पर निर्भर करते हैं। जब ऊर्जा महँगी होती है, तो भोजन भी महँगा हो जाता है और इसका सबसे अधिक असर गरीब आबादी पर पड़ता है।
इस संकट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जब भूख की समस्या बढ़ रही है, उसी समय मानवीय सहायता के लिए उपलब्ध संसाधन घटते जा रहे हैं। विश्व खाद्य कार्यक्रम के अनुसार 2026 में उसे लगभग 40 प्रतिशत तक की फंडिंग कटौती का सामना करना पड़ा है। इसके कारण एजेंसी को अपनी सहायता सीमित करनी पड़ रही है और वह केवल सबसे अधिक जरूरतमंद लोगों तक ही सहायता पहुँचा पा रही है।
इस परिदृश्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक ओर दुनिया भूख से जूझ रही है और दूसरी ओर वैश्विक सैन्य खर्च लगातार रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच रहा है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार दुनिया भर में रक्षा बजट पर हर वर्ष अरबों डॉलर खर्च किए जा रहे हैं। इसके विपरीत विश्व खाद्य कार्यक्रम का अनुमान है कि वैश्विक भूख संकट से निपटने के लिए अपेक्षाकृत बहुत कम संसाधनों की आवश्यकता है। यह विरोधाभास स्पष्ट करता है कि भूख केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि राजनीतिक प्राथमिकताओं का प्रश्न है।
इतिहास बताता है कि जहाँ शांति और स्थिरता होती है, वहाँ खाद्य सुरक्षा की संभावना अधिक होती है। इसके विपरीत जहाँ युद्ध और अस्थिरता होती है, वहाँ भूख और कुपोषण तेजी से बढ़ते हैं। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इस बात पर जोर देती हैं कि भूख से लड़ने के लिए केवल खाद्य सहायता पर्याप्त नहीं है। इसके लिए संघर्ष समाधान, जलवायु अनुकूलन, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा जैसी व्यापक नीतियों की आवश्यकता है।
वैश्विक भूख का संकट अंततः मानवता के सामने एक नैतिक प्रश्न के रूप में खड़ा है। जब पृथ्वी पर भोजन पर्याप्त है और संसाधन उपलब्ध हैं, तब भी यदि करोड़ों लोग भूखे रह जाते हैं, तो यह हमारी सामूहिक विफलता का प्रमाण है। 31.8 करोड़ लोगों की भूख केवल आँकड़ा नहीं, बल्कि उन असंख्य परिवारों की पीड़ा का प्रतीक है, जिनके लिए भोजन आज भी एक अनिश्चित भविष्य है। यदि वैश्विक समुदाय अपनी प्राथमिकताओं को पुनः निर्धारित कर सके और संसाधनों को जीवन की रक्षा की दिशा में लगाए, तो यह संकट काफी हद तक कम किया जा सकता है। अन्यथा इतिहास यह दर्ज करेगा कि जब मानव सभ्यता अपनी तकनीकी शक्ति के शिखर पर थी, उसी समय लाखों लोग भूख से जूझ रहे थे और दुनिया युद्ध की तैयारी में व्यस्त थी।
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