भारतीय समाज में बहू को बेटी जैसा सम्मान दिए जाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा गया है कि इससे दहेज प्रताड़ना जैसी सामाजिक समस्याओं में कमी आएगी और वास्तविक सामाजिक विकास की दिशा मजबूत होगी।
09 मई।
भारतीय समाज में महिलाओं के सम्मान और पारिवारिक मूल्यों की बातें सदियों से की जाती रही हैं। मां को ममता का प्रतीक, बहन को सम्मान और बेटी को घर की खुशहाली माना जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि वही समाज विवाह के बाद एक लड़की को बहू के रूप में स्वीकार करते समय अक्सर अपनी संवेदनशीलता और समानता की भावना खो देता है। यही सोच दहेज प्रताड़ना, घरेलू तनाव और पारिवारिक विघटन जैसी समस्याओं की बड़ी वजह बनती जा रही है। हाल ही में एक पुलिस अधिकारी द्वारा दिया गया यह संदेश कि जिस दिन समाज बहू को बेटी के रूप में स्वीकार कर लेगा, दहेज प्रताड़ना के मामले स्वतः कम हो जाएंगे, सामाजिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण और विचारणीय है। यह कथन केवल भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि भारतीय परिवार व्यवस्था की वास्तविकता पर आधारित एक तार्किक टिप्पणी है।
देश में दहेज निषेध कानून, घरेलू हिंसा अधिनियम और महिलाओं की सुरक्षा के लिए अनेक कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। इसके बावजूद दहेज प्रताड़ना के मामले लगातार सामने आते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि समस्या केवल कानून की नहीं, बल्कि मानसिकता की है। आज भी कई परिवार विवाह को सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक लेन-देन से जोड़कर देखते हैं। बहू को परिवार के सदस्य के बजाय “जिम्मेदारी” या “अपेक्षाओं” के दायरे में रख दिया जाता है। उससे त्याग, सहनशीलता और हर परिस्थिति में समायोजन की उम्मीद की जाती है, जबकि उसके अधिकार, भावनाएं और आत्मसम्मान कई बार नजरअंदाज कर दिए जाते हैं।
भारतीय समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि स्त्री के प्रति व्यवहार उसके रिश्ते के अनुसार बदल जाता है। अपनी बेटी की खुशी और स्वतंत्रता की चिंता करने वाला परिवार कई बार बहू से केवल जिम्मेदारियों और त्याग की अपेक्षा करता है। जबकि वास्तविकता यह है कि बहू भी किसी घर की बेटी होती है, जो अपना परिवार छोड़कर नए माहौल में जीवन की शुरुआत करती है। यदि उसे सम्मान, विश्वास और अपनापन मिले तो परिवार अधिक मजबूत और संतुलित बन सकता है। वास्तविक सामाजिक विकास वही होगा, जहां हर महिला को रिश्तों के आधार पर नहीं बल्कि इंसान होने के नाते समान सम्मान मिले।