सामाजिक संबंधों में बढ़ती दूरी, मानसिक तनाव और संवाद की कमी के कारण हिंसक घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे पारिवारिक संरचना और सामाजिक संतुलन प्रभावित हो रहा है।
25 अप्रैल।
बीते कुछ समय में सामने आईं कुछ भयावह घटनाएँ हमारे समाज के भीतर पनप रही एक गहरी दरार की ओर संकेत करती हैं। रिश्तों की वह पवित्रता, जो कभी विश्वास, त्याग और संवाद की नींव पर खड़ी थी, आज कहीं खोती हुई दिखाई देती है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से आईं निर्मम हत्याओं की खबरें केवल अपराध नहीं हैं, ये हमारे सामाजिक ताने-बाने के बिखरने की दर्दनाक गवाही हैं। क्षणिक आवेश में, गुस्से के अंधेपन में कोई पति अपनी पत्नी का सिर काट देता है और बिना पछतावे के उसे बोरी में भरकर घूमता है। कोई प्रेमिका अपने ही प्रेमी को कुर्सी से बांधकर जला देती है। यह केवल कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि उस मानसिकता का आईना है, जिसमें इंसान भावनाओं से अधिक हिंसा के करीब होता जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है।
एक समय था जब संयुक्त परिवार भारतीय समाज की रीढ़ हुआ करते थे। घर में दादा-दादी की समझ, माता-पिता का अनुशासन और चाचा-चाची का स्नेह—ये सब मिलकर एक संतुलित भावनात्मक वातावरण तैयार करते थे। किसी भी तनाव या समस्या का समाधान बातचीत से निकलता था। व्यक्ति अकेला नहीं था, उसके पास सहारा था, सुनने वाले लोग थे। आज तस्वीर बदल चुकी है। एकल परिवारों का चलन बढ़ा है—माता-पिता और एक बच्चा। बाहर से यह आधुनिकता का प्रतीक लगता है, लेकिन भीतर से यह भावनात्मक खालीपन को जन्म दे रहा है। बच्चे कम उम्र से ही अकेलेपन के आदी हो जाते हैं। माता-पिता अपनी व्यस्त जिंदगी में उलझे रहते हैं और संवाद की जगह मोबाइल स्क्रीन ले लेती है। परिवार में रहते हुए भी एक दूरी, एक खामोशी पनपने लगती है।
मोबाइल और डिजिटल दुनिया ने हमें जोड़ा जरूर है, लेकिन साथ ही हमें भीतर से तोड़ा भी है। आभासी रिश्ते असली रिश्तों की जगह लेने लगे हैं। भावनाओं को समझने की क्षमता कमजोर होती जा रही है। धैर्य खत्म हो रहा है और गुस्सा एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया बनता जा रहा है। यही गुस्सा जब अनियंत्रित होता है, तो वह हिंसा में बदल जाता है।
इसके साथ ही समाज में बढ़ती कट्टरता भी एक बड़ी चिंता है। विचारों में कठोरता, असहिष्णुता और ‘मैं सही हूं’ की जिद ने रिश्तों में लचीलापन खत्म कर दिया है। पहले जहां मतभेद संवाद से सुलझते थे, आज वहीं अहंकार टकराव को जन्म देता है। रिश्तों में विश्वास की जगह शक ने ले ली है और प्यार की जगह नियंत्रण की भावना बढ़ गई है।
यह भी सच है कि आज के समय में मानसिक स्वास्थ्य पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। तनाव, अवसाद, असुरक्षा—ये सब धीरे-धीरे व्यक्ति के भीतर जमा होते रहते हैं। जब इन्हें व्यक्त करने का कोई माध्यम नहीं मिलता, तो ये विस्फोटक रूप ले लेते हैं। दुर्भाग्य से हमारे समाज में आज भी मानसिक समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
समाधान क्या है? सबसे पहले हमें अपने परिवारों में संवाद को पुनर्जीवित करना होगा। बच्चों के साथ समय बिताना, उनकी भावनाओं को समझना, उन्हें सुनना—ये छोटी-छोटी बातें बड़े बदलाव ला सकती हैं। हमें तकनीक का संतुलित उपयोग सीखना होगा, ताकि वह हमारे रिश्तों को मजबूत करे, कमजोर नहीं। संयुक्त परिवारों की वापसी संभव हो या नहीं, लेकिन उनके मूल्यों को जरूर अपनाया जा सकता है—साझेदारी, सहनशीलता और आपसी सहयोग। समाज को भी अधिक संवेदनशील बनना होगा, जहां लोग एक-दूसरे के दर्द को समझें, न कि उसे नजरअंदाज करें।
यह केवल सरकार या कानून की जिम्मेदारी नहीं है। यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम अपने भीतर झांकें और यह समझें कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। रिश्ते केवल खून या कागज से नहीं बनते, वे विश्वास और संवेदना से बनते हैं। यदि हम इन्हें खो देंगे, तो समाज का ढांचा केवल एक ढांचा रह जाएगा—बिना आत्मा के।
आज जरूरत है रुककर सोचने की, जुड़ने की और उस इंसानियत को फिर से जीवित करने की, जो कभी हमारे समाज की पहचान हुआ करती थी।