कोचिंग संस्थानों में बढ़ती फीस, कम पारदर्शिता और कमजोर निगरानी ने शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे छात्रों और अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।
25 अप्रैल।
देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के नाम पर चल रहा कोचिंग उद्योग अब शिक्षा का मंदिर नहीं, बल्कि खुलेआम चल रही “कमाई की फैक्ट्री” बन चुका है। गली-मोहल्लों से लेकर बड़े शहरों तक फैले इन कोचिंग संस्थानों ने ऐसा जाल बिछा रखा है कि छात्र और अभिभावक लुभावने विज्ञापनों के मायाजाल में फंसकर अपनी जिंदगी की जमा-पूंजी तक दांव पर लगा देते हैं।
तीन से पांच लाख रुपये तक की भारी फीस वसूली जाती है, लेकिन न कोई पक्की रसीद, न पारदर्शिता और न ही जवाबदेही। यह सिर्फ शिक्षा नहीं, बल्कि सुनियोजित आर्थिक शोषण है। हैरानी की बात यह है कि न आयकर विभाग की सख्ती दिखती है और न ही राज्य के शिक्षा विभागों की कोई ठोस कार्रवाई। मानो सब कुछ “सेटिंग” के तहत चल रहा हो।
इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर जैसे शहरों में ये संस्थान खुद को “टॉपर्स की फैक्ट्री” बताते हैं। हर साल हजारों छात्रों को एडमिशन दिया जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि उनमें से गिने-चुने 2-3 प्रतिशत छात्र ही सफल हो पाते हैं। बाकी छात्र केवल भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाते हैं।
इन संस्थानों में शिक्षकों की योग्यता पर कोई निगरानी नहीं है। एक-एक क्लास में 50-60 छात्रों को बैठाकर “पर्सनल अटेंशन” का दावा करना छात्रों के साथ मजाक है।
सबसे ज्यादा असर गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ता है, जो कर्ज लेकर फीस भरते हैं और अंत में निराशा हाथ लगती है। अब सवाल है—सरकार कब जागेगी और इस कोचिंग माफिया पर सख्त कार्रवाई कब होगी?