संपादकीय
25 Apr, 2026

कुकड़ू-कूँ का लोकतंत्र: जब वोट बैंक ने पंख उगा लिए

मुर्गी समुदाय की बढ़ती संख्या को आधार बनाकर राजनीति में नए वादों और घोषणाओं ने लोकतांत्रिक प्राथमिकताओं को पूरी तरह बदल दिया, जिससे सामाजिक विमर्श प्रभावित हुआ।

25 अप्रैल।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह मानी जाती है कि यहाँ हर आवाज़ की कीमत है। लेकिन यह बात शायद किसी ने इतनी गंभीरता से नहीं ली थी जितनी इस बार ली गई, जब जनगणना के आँकड़ों ने यह खुलासा किया कि देश में मुर्गी समुदाय की संख्या ऐसी ऊँचाइयों पर पहुँच चुकी है कि अगर उन्हें मतदान का अधिकार दे दिया जाए, तो वे अकेले ही सत्ता का समीकरण बदल सकते हैं। बस फिर क्या था—लोकतंत्र ने अपने सिद्धांतों की किताब बंद की और गणित की कॉपी खोल ली, जिसमें पहला सूत्र लिखा था—“जिसकी संख्या अधिक, उसकी सत्ता सुनिश्चित।”
चुनाव आयोग ने भी इस ऐतिहासिक अवसर को हाथ से जाने नहीं दिया और घोषणा कर दी कि अब हर मुर्गी मतदाता है और हर मुर्गा विशेष मतदाता। देश में पहली बार ऐसा हुआ कि मतदाता सूची के साथ दाने की आपूर्ति सूची भी तैयार होने लगी। मतदान केंद्रों पर ईवीएम के साथ-साथ पानी के कटोरे और दाने की प्लेटें रखी जाने लगीं। लोकतंत्र का यह दृश्य इतना जीवंत था कि लगता था जैसे चुनाव नहीं, कोई विशाल पोल्ट्री मेला आयोजित हो रहा हो।
राजनीति, जो हमेशा से अवसरों की तलाश में रहती है, इस बार भी पीछे नहीं रही। नेताओं ने तुरंत अपने भाषणों की भाषा बदल दी। अब वे विकास, रोजगार और शिक्षा की बात कम और मुर्गी कल्याण की बात अधिक करने लगे। किसी ने हर मुर्गी को मुफ्त दाना देने का वादा किया, तो किसी ने हर मुर्गा के लिए “सुबह जगाने का सम्मान भत्ता” घोषित कर दिया। जो नेता कल तक किसानों के खेतों में फोटो खिंचवाते थे, वे अब मुर्गियों के दड़बों में कैमरे के सामने दाना डालते नजर आने लगे।
लेकिन राजनीति केवल सुविधाओं से नहीं चलती, वह भावनाओं पर भी टिकती है। यही कारण है कि कुछ ही समय में एक खास मुर्गा को “महामुर्गा देव” के रूप में स्थापित कर दिया गया। अब चुनावी सभाओं में यह कहा जाने लगा कि जो इस देवता का सम्मान करेगा, वही सच्चा प्रतिनिधि होगा। मुर्गियों के बीच यह भावना धीरे-धीरे गहराने लगी कि उनका अस्तित्व अब केवल दाने और अंडों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी एक “आस्था” भी है, जिसकी रक्षा करना आवश्यक है। राजनीति ने इस आस्था को इतनी कुशलता से गढ़ा कि तर्क धीरे-धीरे पीछे छूटता चला गया और भावना आगे बढ़ती चली गई।
इसी बीच चुनावी वादों का स्तर और ऊँचा हो गया। कई मंचों से यह घोषणा की गई कि यदि उनकी सरकार बनी, तो मुर्गा को राष्ट्र पशु घोषित कर दिया जाएगा। इस घोषणा ने देश में एक नई बहस को जन्म दिया, लेकिन राजनीति के पास उसका भी सरल उत्तर था—जो हर घर में मौजूद है, वही राष्ट्र का सबसे सच्चा प्रतीक है। इसके साथ ही यह भी वादा किया गया कि मुर्गों और मुर्गियों के लिए विशेष आरक्षित वन बनाए जाएंगे, जहाँ केवल वही रहेंगे और उनकी सुरक्षा, पोषण और विकास की पूरी जिम्मेदारी राज्य की होगी। इन वनों की कल्पना इतनी भव्य थी कि उसमें वातानुकूलित दड़बे, संतुलित आहार और स्वास्थ्य सेवाओं की संपूर्ण व्यवस्था का वादा शामिल था।
सरकार बनाने की होड़ में योजनाओं की ऐसी झड़ी लगी कि आम नागरिक को भी अपने अधिकारों पर संदेह होने लगा। "हर घर मुर्गी, हर घर अंडा", "प्रधानमंत्री दाना योजना”, “राष्ट्रीय अंडा सुरक्षा मिशन” और “मुर्गा स्वास्थ्य बीमा योजना” जैसी घोषणाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब राजनीति का केंद्र बदल चुका है। यह परिवर्तन केवल नीतियों का नहीं था, बल्कि प्राथमिकताओं का भी था। इंसानों की समस्याएँ धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चली गईं और मुर्गी समुदाय की आवश्यकताएँ मुख्यधारा में आ गईं।
सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब मांसाहार पर पूर्ण प्रतिबंध की घोषणा की गई। यह निर्णय अचानक नहीं था, बल्कि उस लंबे राजनीतिक गणित का परिणाम था जिसमें वोट की कीमत स्वाद से कहीं अधिक थी। जो नेता कल तक चिकन व्यंजन के बिना अपने भोज की कल्पना नहीं करते थे, वे आज सार्वजनिक रूप से यह कहने लगे कि उन्होंने कभी मुर्गी को हाथ तक नहीं लगाया। रेस्टोरेंट्स के मेन्यू बदल गए, और “चिकन” शब्द धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से गायब होने लगा।
-- डॉ. शैलेश शुक्ला
|
आज का राशिफल

इस सप्ताह आपके लिए अनुकूल समय है। पेशेवर मोर्चे पर सफलता मिलने के योग हैं। व्यक्तिगत जीवन में भी सुकून और संतोष रहेगा।
भाग्यशाली रंग: लाल
भाग्यशाली अंक: 9
मंत्र: "ॐ हं राम रामाय नमः"

आज का मौसम

भोपाल

27° / 40°

SUNNY

ट्रेंडिंग न्यूज़