एक साहब बड़ी मेहनत से जिले में पोस्टिंग लेकर आए थे—सपना था काम करने का। काम तो खूब है, पर खजाना खाली है। राजधानी के चक्कर, विभागों के दरवाजे—सब खटखटा लिए, जवाब वही—“सरकार कर्ज में है।” जिले में योजनाएं फाइलों में दौड़ रही हैं, जमीन पर नहीं। साहब की चिंता बढ़ रही है—अब देखना यह है कि सरकार उनकी गंभीरता को कब गंभीरता से लेती है, या फिर यह भी एक फाइल बनकर रह जाएगा।












