काठमांडू, 16 मई।
नेपाल के मिथिलांचल और तराई-मधेश क्षेत्र में शनिवार को वट सावित्री पर्व श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया, जहां सुहागिन महिलाओं ने पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के साथ व्रत रखकर पूजा-अर्चना की।
जेठ माह की अमावस्या तिथि पर मनाए जाने वाले इस पर्व पर सुबह से ही विभिन्न गांवों और शहरों में बरगद वृक्षों के नीचे पूजा करने वाली महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी, जहां पारंपरिक वेशभूषा और श्रृंगार में महिलाएं विधि-विधान से व्रत अनुष्ठान में शामिल हुईं।
इस अवसर पर नवविवाहित महिलाओं के लिए ससुराल पक्ष की ओर से पूजा सामग्री, वस्त्र और अन्य उपहार भेजने की परंपरा भी निभाई गई, जिसे स्थानीय भाषा में ‘पाहुर’ कहा जाता है और इसे मिथिलांचल की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
हिंदू मान्यता के अनुसार बरगद का वृक्ष अत्यंत पवित्र माना जाता है, जिसमें देवताओं का वास होने की धारणा है, इसलिए महिलाएं कच्चे सूती धागे से वृक्ष की परिक्रमा कर वट सावित्री की कथा का श्रवण करती हैं और पूजा संपन्न करती हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार माता सावित्री ने अपने तप, संकल्प और सतीत्व के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे, इसी घटना की स्मृति में यह पर्व प्राचीन काल से मनाया जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्रत वैवाहिक जीवन में सुख, पति की दीर्घायु और संतान प्राप्ति का आशीर्वाद प्रदान करता है, जिसके कारण महिलाओं में इस पर्व को लेकर विशेष आस्था और उत्साह देखा गया।
समय के साथ यह पर्व केवल मिथिलांचल तक सीमित न रहकर नेपाल के अन्य समुदायों में भी आस्था और परंपरा के साथ मनाया जाने लगा है, जिससे यह सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बनता जा रहा है।










