धमतरी, 16 मई।
ज्येष्ठ अमावस्या के अवसर पर शनिवार को वट सावित्री पर्व पूरे क्षेत्र में श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। यह पर्व सुहाग और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है, जिसमें शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक सुहागिन महिलाओं ने वट वृक्षों के नीचे एकत्र होकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और अपने पति की दीर्घायु एवं सुख-समृद्धि की कामना की।
सुबह से ही पर्व को लेकर महिलाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। घरों और मंदिरों के आसपास स्थित वट वृक्षों के समीप पारंपरिक परिधान में सजी महिलाएं पूजा की थाल सजाकर पहुंचीं और पूरे विधि-विधान से पूजन किया।
पूजा में गुड़, भीगे चने, आटे से बनी मिठाई, रोली, कुमकुम, मौली, पांच प्रकार के फल, पान पत्ता, धूप, घी का दीपक, जल से भरा लोटा और हाथ का पंखा शामिल रहा। महिलाओं ने वट वृक्ष की जड़ों में जल अर्पित कर धूप-दीप प्रज्वलित किए और प्रसाद चढ़ाकर पूजा संपन्न की। इसके बाद वट वृक्ष के चारों ओर मौली धागा लपेटकर सुखी वैवाहिक जीवन की कामना की गई। अंत में एक-दूसरे को प्रसाद वितरित कर पर्व की शुभकामनाएं दी गईं।
वट वृक्ष के समीप पूजा कर रही डुमेश्वरी सिन्हा, मनीषा सिन्हा, सविता पांडे सहित अन्य महिलाओं ने बताया कि वे हर वर्ष नियमपूर्वक यह व्रत करती हैं। उनके अनुसार यह पर्व भारतीय संस्कृति और वैवाहिक परंपराओं का महत्वपूर्ण प्रतीक है। पौराणिक कथा के अनुसार सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और तप से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे, तभी से यह पर्व अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है।
पंडित राजकुमार तिवारी ने बताया कि वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को मनाया जाता है और इस वर्ष सोमवती अमावस्या, सर्वार्थसिद्ध योग, अमृतसिद्ध योग तथा त्रिग्रही योग का विशेष संयोग बनने से दिन अत्यंत शुभ माना गया। उन्होंने यह भी बताया कि मान्यता के अनुसार इसी दिन शनिदेव का जन्म हुआ था, इसलिए महिलाएं वट और पीपल वृक्ष की पूजा कर शनिदेव की कृपा प्राप्त करती हैं।













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