वॉशिंगटन, 20 अप्रैल।
ट्रंप प्रशासन के दौरान लगाए गए उन आयात शुल्कों (टैरिफ) को वापस पाने की प्रक्रिया सोमवार सुबह 8 बजे से आधिकारिक तौर पर शुरू हो गई है, जिन्हें अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया था। अमेरिकी सीमा शुल्क और सीमा सुरक्षा (सीबीपी) ने इसके लिए एक समर्पित ऑनलाइन पोर्टल सक्रिय कर दिया है। इस व्यवस्था के माध्यम से अब आयातक और उनके ब्रोकर उन भुगतानों की वापसी के लिए दावा पेश कर सकेंगे, जो आपातकालीन शक्तियों का उपयोग कर लगाए गए शुल्कों के रूप में वसूले गए थे।
यह पूरी प्रक्रिया 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए 6-3 के ऐतिहासिक फैसले का परिणाम है। न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया था कि तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आपातकालीन शक्तियों के तहत टैरिफ लगाकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया था। अदालत के अनुसार, व्यापार घाटे को राष्ट्रीय आपातकाल बताकर व्यापक आयात शुल्क लागू करना कांग्रेस के कर-निर्धारण संबंधी अधिकारों का अतिक्रमण था। हालांकि कोर्ट ने सीधे तौर पर रिफंड का जिक्र नहीं किया था, लेकिन बाद में इंटरनेशनल ट्रेड कोर्ट ने कंपनियों को भुगतान वापस पाने का हकदार माना।
अदालती दस्तावेजों में प्रस्तुत सीबीपी के आंकड़ों के मुताबिक, यह मामला काफी बड़ा है। लगभग 3.30 लाख से अधिक आयातकों ने 5.3 करोड़ से ज्यादा शिपमेंट पर करीब 166 अरब डॉलर का भुगतान किया था। अप्रैल के मध्य तक के रिकॉर्ड के अनुसार, 56,497 आयातक इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली में पंजीकृत हो चुके हैं, जो ब्याज सहित लगभग 127 अरब डॉलर के रिफंड के पात्र हैं। फिलहाल यह प्रक्रिया चरणों में संचालित की जा रही है, जिसमें शुरुआती तौर पर केवल विशिष्ट प्रविष्टियों और हालिया भुगतानों को प्राथमिकता दी गई है।
दिलचस्प बात यह है कि इस रिफंड का सीधा लाभ आम उपभोक्ताओं को मिलने की संभावना कम है। हालांकि कंपनियों ने टैरिफ का बोझ बढ़ी हुई कीमतों के जरिए ग्राहकों पर डाला था, लेकिन सरकार से मिलने वाला पैसा सीधे व्यवसायों के पास जाएगा। इसे लेकर कुछ बड़ी कंपनियों जैसे कोस्टको और एसिलर लक्सोटिका को उपभोक्ता मुकदमों का सामना भी करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, फेडेक्स और यूपीएस जैसी कूरियर कंपनियों ने संकेत दिया है कि वे उपभोक्ताओं से वसूले गए शुल्कों का रिफंड मिलने पर उसे आगे पास करने की योजना बना रही हैं। सीबीपी ने चेतावनी दी है कि तकनीकी और प्रक्रियात्मक जांच के कारण भुगतान में कुछ देरी हो सकती है।








