नई दिल्ली, 20 अप्रैल।
उच्चतम न्यायालय ने डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यह बेहद हैरान करने वाली बात है कि उच्च शिक्षित लोग भी इस तरह के साइबर फ्रॉड का शिकार हो रहे हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि इस समस्या से निपटने के लिए इंटरमीडियरी प्लेटफॉर्म्स पर ‘किल स्विच’ जैसी व्यवस्था लागू होनी चाहिए, क्योंकि कई बार पीड़ित डिजिटल अरेस्ट की स्थिति को समझते हुए भी मानसिक दबाव में प्रतिक्रिया नहीं दे पाते।
अटार्नी जनरल आर वेंकटरमनी ने बताया कि इस विषय पर संबंधित विभागों के बीच आंतरिक बैठक हो चुकी है और जल्द ही अंतिम बैठक भी प्रस्तावित है। उन्होंने सुझाव दिया कि अगली सुनवाई 12 मई को निर्धारित की जा सकती है।
इससे पहले 1 दिसंबर 2025 को अदालत ने डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों को गंभीर मानते हुए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता जताई थी और सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। अदालत ने यह भी कहा था कि साइबर अपराध में शामिल बैंक खातों की जांच में बैंकों की भूमिका की भी जांच जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्व बैंक को निर्देश दिया था कि संदेहास्पद खातों की पहचान और उन्हें फ्रीज करने के लिए एआई और मशीन लर्निंग तकनीक के उपयोग पर विचार किया जाए। जिन राज्यों ने सीबीआई जांच की अनुमति नहीं दी थी, उन्हें भी सहयोग करने के निर्देश दिए गए थे।
एमिकस क्यूरी ने बताया था कि साइबर अपराध मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं—डिजिटल अरेस्ट, निवेश धोखाधड़ी और पार्ट-टाइम जॉब के नाम पर ठगी।
अदालत ने यह भी पाया कि इन मामलों में लोगों को भारी निवेश के लिए मजबूर किया जाता है। 17 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार और सीबीआई को नोटिस जारी किया था और कहा था कि इस तरह की घटनाएं न्यायिक व्यवस्था में विश्वास को कमजोर करती हैं।
अंबाला के एक बुजुर्ग दंपति से जुड़ी घटना पर भी अदालत ने स्वतः संज्ञान लिया था, जिसमें फर्जी अदालत आदेश दिखाकर एक करोड़ रुपये से अधिक की ठगी की गई थी। दंपति ने नकली कोर्ट आदेश और वीडियो कॉल के जरिए धोखाधड़ी की शिकायत की थी।



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