भोपाल, 22 जून।
डिग्री छापने की फैक्ट्री अब दिमाग गढ़ने की लेबोरेटरी बनेगी। मध्यप्रदेश सरकार ने चिकित्सा शिक्षा का रुख मोड़ दिया है। प्रदेश के मेडिकल विश्वविद्यालय से जुड़े 50 कॉलेजों में अब एलोपैथी से लेकर आयुर्वेद और होम्योपैथी तक में पीएचडी शुरू होगी। 50 हजार से ज्यादा छात्र शोध के क्षेत्र में उतरेंगे। फैसला छोटा दिखता है, लेकिन असर बड़ा होगा। ब्रेन ड्रेन रुकेगा और ब्रेन गेन शुरू होगा।
आंकड़ों पर नजर डालें तो 75 कॉलेज, 50 हजार छात्र और छह चिकित्सा पद्धतियों के साथ इतनी बड़ी शोध क्षमता देश में कम ही देखने को मिलती है। अभी तक मध्यप्रदेश का मेडिकल छात्र एमबीबीएस के बाद एमडी-एमएस के लिए दिल्ली या बेंगलुरु जाता था और शोध के लिए विदेश का रुख करता था। नतीजा यह हुआ कि प्रतिभा बाहर जाती रही और पेटेंट भी बाहर बनते रहे। सरकार ने अब नए सत्र से पुरानी व्यवस्था समाप्त कर दी है। यानी हर कॉलेज हर साल शोध करेगा। लंबे समय से प्रदेश में चिकित्सा पाठ्यक्रमों में पीएचडी की सुविधा नहीं थी, इसलिए छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाना पड़ता था। अब यह आवश्यकता कम होगी।
भारत डॉक्टर तो बड़ी संख्या में तैयार करता है, लेकिन खोजकर्ता कम बनाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रति 10 लाख आबादी पर केवल 255 शोधकर्ता हैं, जबकि अमेरिका में यह संख्या 4,200 है। अंतर यहीं से शुरू होता है। कोरोना महामारी के दौरान वैक्सीन का प्लेटफॉर्म विदेशों का था। सिकल सेल, कुपोषण और आदिवासी क्षेत्रों की बीमारियों पर भारत केंद्रित शोध अभी भी सीमित है। मध्यप्रदेश के पास इस दिशा में बड़ा अवसर है। यहां आदिवासी आबादी लगभग 21 प्रतिशत है और सिकल सेल के मामले भी बड़ी संख्या में मिलते हैं। यदि भोपाल, इंदौर और जबलपुर के मेडिकल कॉलेज स्थानीय समस्याओं पर वैश्विक स्तर के शोध करेंगे तो पूरी दुनिया उनका संज्ञान लेगी। आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा को पीएचडी से जोड़ना भी इसी सोच का विस्तार है।
इस व्यवस्था से छात्रों को नया विकल्प मिलेगा। एमडी-एमएस की सीटें सीमित हैं और प्रतिस्पर्धा बहुत अधिक है। पीएचडी के माध्यम से अकादमिक क्षेत्र, फार्मा अनुसंधान और नीति निर्माण में भी नए अवसर खुलेंगे। समाज को भी स्थानीय समस्याओं के स्थानीय समाधान मिलेंगे। गांव की बीमारी पर गांव का डॉक्टर शोध करेगा तो उपचार अधिक प्रभावी और कम खर्चीला होगा। साथ ही मेडिकल कॉलेजों की राष्ट्रीय रैंकिंग और शोध क्षमता में भी सुधार होगा।
हालांकि केवल पीएचडी शुरू कर देने से गुणवत्ता नहीं आती। देश में फर्जी शोध पत्र प्रकाशित कराने वाले जर्नलों का बाजार पहले से मौजूद है। यदि मध्यप्रदेश में भी डिग्री बेचने की संस्कृति विकसित हुई तो पूरी पहल का उद्देश्य समाप्त हो जाएगा। शोध मार्गदर्शक स्वयं सक्षम शोधकर्ता हों, यह सुनिश्चित करना होगा। कई कॉलेजों में आज भी फैकल्टी की कमी है। बिना मार्गदर्शक के पीएचडी केवल कागजी प्रक्रिया बनकर रह जाएगी। आधुनिक प्रयोगशालाएं, शोध उपकरण, जर्नल की उपलब्धता और पर्याप्त वित्तीय सहायता के बिना शोध केवल सिद्धांत बनकर रह जाएगा। साथ ही यह भी विचार करना होगा कि एमबीबीएस, एमडी और पीएचडी की लंबी अवधि के कारण छात्र बीच में न छूट जाएं। इसके लिए एकीकृत मॉडल पर भी विचार आवश्यक है।
फैसला स्वागतयोग्य है, लेकिन उसकी असली परीक्षा क्रियान्वयन में होगी। प्रत्येक विश्वविद्यालय में प्लेजरिज्म की सख्त निगरानी हो, फर्जी जर्नलों को ब्लैकलिस्ट किया जाए, शोध मार्गदर्शकों को विशेष प्रशिक्षण मिले और प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ सहयोग बढ़ाया जाए। प्रत्येक कॉलेज को शोध के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता मिले तथा एमबीबीएस स्तर से ही शोध परियोजनाओं को अनिवार्य बनाया जाए, ताकि छात्र डिग्री के साथ शोध प्रकाशन भी हासिल कर सकें।
सरकार ने मंच तैयार कर दिया है, अब जिम्मेदारी चिकित्सा संस्थानों और विद्यार्थियों की है। चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब शोध प्रयोगशाला से निकलकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचे। मध्यप्रदेश ने संकेत दिया है कि विकास केवल सड़क और पुलों से नहीं, बल्कि ज्ञान और नवाचार से भी होता है। यदि स्टेथोस्कोप के साथ माइक्रोस्कोप भी समान महत्व पाए तो प्रदेश भविष्य में केवल डॉक्टर ही नहीं, बल्कि नई खोजों का केंद्र भी बन सकता है। डिग्री बांटना आसान है, दिमाग जगाना कठिन। सरकार ने कठिन रास्ता चुना है, अब परिणाम ही उसकी सफलता की असली कसौटी होंगे।









