संपादकीय
22 Jun, 2026

अटलांटिक का दिल धीमा, दुनिया के लिए साइलेंट सुनामी: धरती का हीटिंग सिस्टम ठंडा पड़ रहा है

अटलांटिक महासागर की एएमओसी धारा के कमजोर पड़ने से वैश्विक जलवायु, यूरोप के तापमान और भारतीय मानसून पर दूरगामी प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

लंदन, 22 जून।

अटलांटिक महासागर में बहने वाली वह विशाल समुद्री धारा, जो यूरोप को गर्म रखती है और दुनिया के मौसम को संतुलित करती है, पिछले कई दशकों से धीमी पड़ रही है। इसे अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (एएमओसी) या पृथ्वी की समुद्री कन्वेयर बेल्ट कहा जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह धारा अपने ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर के करीब पहुंच चुकी है। सबसे बड़ा खतरा यह नहीं कि यह आज ही रुक जाएगी, बल्कि यह है कि यह एक ऐसे टिपिंग पॉइंट के करीब पहुंच रही है, जहां से इसका संतुलन अचानक बिगड़ सकता है। यदि ऐसा हुआ तो अटलांटिक का दिल थम जाएगा और पूरी दुनिया का मौसम तंत्र वेंटिलेटर पर पहुंच सकता है।

एएमओसी को पृथ्वी के रक्त संचार की तरह समझा जा सकता है। अटलांटिक के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से गर्म पानी उत्तर की ओर बहता है, जिसे गल्फ स्ट्रीम कहा जाता है। ग्रीनलैंड और आइसलैंड के पास पहुंचकर यह पानी ठंडा और भारी होकर समुद्र की गहराइयों में डूब जाता है। यही गहरा पानी दक्षिण की ओर बहते हुए पूरे महासागर में ऑक्सीजन और पोषक तत्वों का वितरण करता है। इसी प्रक्रिया के कारण यूरोप अपेक्षाकृत गर्म रहता है और वैश्विक जलवायु संतुलित बनी रहती है। लेकिन अब यही प्राकृतिक कन्वेयर बेल्ट कमजोर पड़ रही है।

पिछले एक हजार वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि एएमओसी अपनी सबसे कमजोर स्थिति में है। ग्रीनलैंड की बर्फ तेजी से पिघल रही है और उसका मीठा पानी समुद्र में मिल रहा है। मीठा पानी नमकीन पानी की तुलना में हल्का होता है, इसलिए वह आसानी से गहराई में नहीं डूबता। यदि पानी का यह डूबने वाला चक्र बाधित हुआ तो पूरी ओवरटर्निंग प्रक्रिया प्रभावित होगी। वैज्ञानिक इसे पूर्ण बंद होने के बजाय 'स्लोडाउन' कहते हैं, लेकिन जलवायु विज्ञान में यही धीमापन बड़े संकट की शुरुआत माना जाता है। पिछले दो दशकों में इसकी गति लगभग 15 प्रतिशत तक घट चुकी है और अनुमान है कि इस सदी के अंत तक इसमें 34 से 45 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।

यदि एएमओसी गंभीर रूप से कमजोर हुआ तो इसका असर पूरी दुनिया पर एक साथ दिखाई देगा। यूरोप में औसत तापमान 3 से 5 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है। ब्रिटेन, स्कैंडिनेविया और उत्तरी यूरोप में लंबी और कठोर सर्दियां लौट सकती हैं, जिससे कृषि और ऊर्जा व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ेगा। ग्लोबल वार्मिंग के दौर में यूरोप का अत्यधिक ठंडा होना एक जलवायु विरोधाभास होगा, लेकिन एएमओसी के कमजोर पड़ने से यह संभव है।

भारत के लिए भी यह खतरा कम गंभीर नहीं है। एएमओसी और भारतीय मानसून का गहरा संबंध माना जाता है। अटलांटिक के ठंडा होने से मानसूनी हवाओं का स्वरूप बदल सकता है। इसके परिणामस्वरूप कहीं अत्यधिक वर्षा और कहीं भीषण सूखा देखने को मिल सकता है। बारिश के दिनों की संख्या घट सकती है, लेकिन जब वर्षा होगी तो वह क्लाउड बर्स्ट जैसी तीव्र हो सकती है। कृषि प्रधान भारत के लिए यह खाद्य सुरक्षा और जल प्रबंधन दोनों के लिए गंभीर चुनौती होगी।

समुद्र का बढ़ता स्तर और शक्तिशाली तूफान भी इस बदलाव के संभावित परिणाम हैं। उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में समुद्र का स्तर तेजी से बढ़ सकता है, जिससे तटीय शहरों पर खतरा बढ़ेगा। वहीं दक्षिणी गोलार्ध में अतिरिक्त गर्मी फंसने से ब्राजील, अर्जेंटीना और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में हीटवेव अधिक तीव्र हो सकती है तथा अमेजन के वर्षावनों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता टिपिंग पॉइंट को लेकर है। यदि एएमओसी एक निश्चित सीमा से अधिक कमजोर हो गया तो उसका स्वाभाविक रूप से पूर्व स्थिति में लौटना संभव नहीं होगा। पृथ्वी के इतिहास में लगभग 12 हजार वर्ष पहले यंगर ड्रायस काल में ऐसा परिवर्तन देखा गया था, जब यूरोप का तापमान कुछ ही दशकों में लगभग 10 डिग्री तक गिर गया था। आज मानवजनित कार्बन उत्सर्जन और ग्रीनलैंड की पिघलती बर्फ उसी प्रकार की परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं।

इस संकट के प्रमुख कारण ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीनलैंड की बर्फ का तेजी से पिघलना हैं। हर वर्ष अरबों टन मीठा पानी अटलांटिक में मिल रहा है, जिससे समुद्री संतुलन बिगड़ रहा है। इसलिए कार्बन उत्सर्जन में कमी, स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेज बदलाव और वैश्विक जलवायु प्रतिबद्धताओं का पालन अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है। भारत सहित सभी देशों को बदलते मानसून, बाढ़, सूखा और तटीय खतरों से निपटने के लिए अभी से तैयारी करनी होगी।

एएमओसी का संकट दिखाई नहीं देता, इसलिए वह और अधिक खतरनाक है। जब तक इसके दुष्परिणाम स्पष्ट रूप से सामने आएंगे, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। हर टन कार्बन डाइऑक्साइड और हर पिघलता ग्लेशियर अटलांटिक के इस प्राकृतिक इंजन को कमजोर कर रहा है। अब सवाल विज्ञान का नहीं, बल्कि वैश्विक इच्छाशक्ति का है। यदि दुनिया समय रहते नहीं चेती तो अटलांटिक का धीमा पड़ता दिल केवल समुद्री धारा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की स्थिरता को भी डगमगा सकता है।

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