प्रेरक कहानियाँ
23 Jun, 2026

आखिरी डिलीवरी

एक डिलीवरी बॉय ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैसे एक बुजुर्ग महिला के साथ बिताए गए कुछ पलों ने उसे जीवन में माँ की अहमियत और मानवीय संवेदनाओं का गहरा पाठ पढ़ाया।

एक डिलीवरी बॉय की आपबीती....

मैं ज़्यादातर शाम की शिफ्ट करता हूँ। उस दिन रात करीब 9 बजे आख़िरी ऑर्डर उठाया। रेस्टोरेंट से पैकेट लिया तो देखा—ऑर्डर छोटा था, बस एक सादा खिचड़ी, दही और दो केले। पता शहर के पुराने हिस्से का था। एक जर्जर-सी बिल्डिंग। ऊपर तीसरी मंज़िल।

डोरबेल दबाई। दरवाज़ा एक बूढ़ी अम्मा ने खोला। सफेद बाल, काँपते हाथ, आँखों पर मोटा चश्मा। चेहरे पर थकान थी, लेकिन आवाज़ में मिठास— “बेटा, ज़रा अंदर रख दो… हाथ काँपते हैं।” मैं खाना टेबल पर रखकर मुड़ा ही था कि उन्होंने पूछा— “दो मिनट बैठोगे? अकेले खाना अच्छा नहीं लगता।”

मैंने घड़ी देखी। शिफ्ट ख़त्म हो चुकी थी। थोड़ा थका था। लेकिन पता नहीं क्यों, मैं बैठ गया। कमरे में सन्नाटा था। दीवार पर पुरानी घड़ी टिक-टिक कर रही थी। एक कोने में भगवान की छोटी-सी तस्वीर। और सामने दीवार पर दर्जनों फ़ोटो। उन्होंने थाली खोली। धीरे-धीरे खिचड़ी खाने लगीं। हर दो कौर के बाद मेरी तरफ देख मुस्कुरा देतीं।

फिर बोलीं— “जानते हो बेटा, मैं रोज़ बाहर से खाना नहीं मँगाती। आज बस मन किया… किसी इंसान की आवाज़ सुनने का।” मैं चुप रहा। उन्होंने सामने लगी तस्वीर की ओर इशारा किया। “ये मेरे पति हैं। रेलवे में थे। पाँच साल पहले चले गए।”

फिर दूसरी तस्वीर— “ये बेटा है। कनाडा में रहता है। बहुत अच्छा है… हर महीने पैसे भेजता है।” फिर थोड़ी देर चुप रहीं। मुस्कुराईं, मगर इस बार आँखें भीग गईं— “बस… समय नहीं भेज पाता।” कमरे में अचानक घड़ी की टिक-टिक बहुत तेज़ सुनाई देने लगी। उन्होंने एक कौर और खाया।

“ये बेटी है। बंगलुरु में। अपनी दुनिया में खुश है। होना भी चाहिए। बच्चे अगर उड़ें नहीं, तो माँ-बाप ने पाला ही क्या?” बोलते-बोलते उनकी आवाज़ भर्रा गई। लेकिन चेहरे पर शिकायत नहीं थी। बस खालीपन था। उन्होंने मुझसे पूछा— “तुम्हारी माँ है?” मैंने कहा—“हाँ।” “फोन करते हो रोज़?”

मैं चुप हो गया। सच ये था कि मैं भी कई-कई दिन घर फोन नहीं करता था। थकान, काम, भागदौड़… हर बार यही सोचकर टाल देता था कि कल कर लूँगा। उन्होंने मेरी चुप्पी पढ़ ली। हल्के से बोलीं— “माँ-बाप पैसे नहीं गिनते बेटा… आवाज़ गिनते हैं।” मेरे भीतर कुछ चुपचाप टूट गया।

खाना खत्म हुआ। उन्होंने पानी पिया। फिर पर्स से 500 रुपये निकालकर मेरी ओर बढ़ाए। “ये टिप नहीं है। ये उस आधे घंटे की कीमत है, जिसमें तुमने मुझे अकेले नहीं खाने दिया।” मैंने तुरंत मना किया— “नहीं अम्मा, ये नहीं ले सकता।” वे मुस्कुराईं— “ले लो। तुमने खाना नहीं पहुँचाया… आज तुमने साथ पहुँचाया है।”

मैंने पैसे ले लिए। लेकिन जेब में नहीं रखे। हाथ में ही पकड़े रहा। जाते-जाते उन्होंने कहा— “और हाँ, आज घर जाकर माँ को फोन ज़रूर करना।” उस रात मैंने बिल्डिंग के नीचे बाइक स्टार्ट नहीं की। पहले माँ को फोन लगाया। उधर से आवाज़ आई— “आज अचानक? सब ठीक है ना?” बस इतना सुनते ही गला भर आया। मैंने कहा— “हाँ माँ… बस आपकी आवाज़ सुननी थी।” उधर कुछ सेकंड ख़ामोशी रही। फिर माँ बोली— “खाना खाया?” और मैं सड़क किनारे खड़ा रो पड़ा।

उस रात के बाद मैं रोज़ माँ को फोन करने लगा। और सिर्फ़ माँ को नहीं, हर डिलीवरी अब मेरे लिए सिर्फ़ ऑर्डर नहीं रही। किसी घर में दवा जाती है। किसी घर में अकेलापन। किसी घर में इंतज़ार। किसी घर में बस एक आवाज़ की ज़रूरत होती है। मैं अब दरवाज़ा खुलने पर जल्दी नहीं करता। चेहरा देखता हूँ। आवाज़ सुनता हूँ। कभी पूछ लेता हूँ— “और सब ठीक?”

ज़्यादातर लोग बस “हाँ” कहते हैं। कुछ लोग मुस्कुरा देते हैं। और कुछ के चेहरे बता देते हैं कि उन्होंने पूरे दिन किसी से बात नहीं की।

दो महीने बाद उसी पते पर फिर ऑर्डर आया। मैं भागकर गया। दरवाज़ा किसी और ने खोला। पड़ोस वाली आंटी थीं। धीरे से बोलीं— “अम्मा पिछले हफ्ते चली गईं।” कुछ सेकंड तक मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। हाथ खाली थे, लेकिन भीतर कुछ भारी गिर चुका था। उन्होंने अंदर से एक छोटा लिफाफा लाकर दिया। “तुम्हारे लिए छोड़ गई थीं।”

हाथ काँपते हुए खोला। अंदर 500 रुपये थे। और एक छोटी-सी पर्ची। उस पर लिखा था— “बेटा, अगर ये पढ़ रहे हो, तो मैं जा चुकी हूँ। धन्यवाद उस रात मेरे साथ खाना खाने के लिए। तुमने मुझे खाना नहीं, सम्मान दिया। और हाँ—माँ को फोन करते रहना। अम्मा”

आज भी वो 500 रुपये मेरे बैग की अंदर वाली जेब में रखे हैं। खर्च नहीं किए क्योंकि उस रात पहली बार समझ आया—हर दरवाज़े के पीछे सिर्फ़ एक ग्राहक नहीं होता। कभी एक माँ होती है। कभी एक इंतज़ार। कभी एक आख़िरी बातचीत। हम सब अपनी-अपनी भूख लेकर जी रहे हैं— किसी को रोटी चाहिए, किसी को दवा, और किसी को बस दो मिनट साथ। इंसान को हमेशा पैसे की नहीं, कभी-कभी बस मौजूदगी की डिलीवरी चाहिए।

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