जबलपुर, 23 जून।
जबलपुर जिले में एक प्रसूता महिला की समय पर चिकित्सा सहायता न मिलने और अस्पताल पहुंचने से पहले मृत्यु हो जाने की घटना केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि उन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न है जो प्रदेश में आधारभूत सुविधाओं और स्वास्थ्य सेवाओं के व्यापक विस्तार के संबंध में किए जाते हैं। यदि किसी महिला को खराब सड़क, समय पर एंबुलेंस न मिलने और चिकित्सा व्यवस्था की कमियों के कारण अपनी जान गंवानी पड़े, तो यह केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता का संकेत है।
पिछले वर्षों में प्रदेश में सड़क निर्माण, स्वास्थ्य सुविधाओं और आपातकालीन सेवाओं के विस्तार के अनेक दावे किए गए हैं। आंकड़ों और घोषणाओं में विकास दिखाई देता है, लेकिन वास्तविक परीक्षा अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने वाली सुविधाओं से होती है। जब किसी गांव की सड़क बारिश में दलदल में बदल जाए, जब एंबुलेंस समय पर न पहुंचे और जब अस्पताल इलाज के बजाय केवल रेफरल का केंद्र बनकर रह जाए, तब विकास के दावों की विश्वसनीयता कमजोर पड़ जाती है।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति विशेष चिंता का विषय है। 108 एंबुलेंस सेवा और प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत बनाने के लिए सरकारों ने अनेक योजनाएं लागू की हैं, लेकिन इनकी सफलता का आकलन कागजी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में मिलने वाली सहायता से होना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी डॉक्टरों की कमी, संसाधनों का अभाव और समय पर उपचार न मिल पाने जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। परिणामस्वरूप गरीब और दूरस्थ क्षेत्रों के नागरिक सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
सड़क और स्वास्थ्य सेवाएं किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल होती हैं। यदि किसी गांव तक पहुंचने का रास्ता सुरक्षित और सुगम नहीं है तो शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास के सभी दावे अधूरे रह जाते हैं। इसी प्रकार स्वास्थ्य सेवाओं में छोटी-सी चूक भी किसी परिवार के लिए अपूरणीय क्षति का कारण बन सकती है। इसलिए ऐसी घटनाओं को केवल दुर्भाग्यपूर्ण कहकर टालना पर्याप्त नहीं है।
इस मामले में जिम्मेदारी तय होना आवश्यक है। संबंधित विभागों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सड़क की स्थिति क्यों खराब थी, एंबुलेंस सेवा समय पर क्यों नहीं पहुंची और स्वास्थ्य संस्थानों में क्या कमियां रहीं। केवल जांच समिति गठित कर देना समाधान नहीं है। दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि विकास का वास्तविक अर्थ राजधानी की चमक या आंकड़ों की उपलब्धियां नहीं, बल्कि अंतिम गांव तक पहुंचने वाली बुनियादी सुविधाएं हैं। जब हर गांव तक पक्की सड़क पहुंचेगी, जब एंबुलेंस समय पर उपलब्ध होगी और जब अस्पतालों में आवश्यक संसाधन मौजूद होंगे, तभी विकास के दावों को सार्थक माना जा सकेगा। ममता की मृत्यु केवल एक परिवार का दुख नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था के लिए चेतावनी है कि विकास के दावों और जमीनी सच्चाई के बीच की दूरी को अब और अनदेखा नहीं किया जा सकता।









