संपादकीय
23 Jun, 2026

कागज पर फसल, धरती पर संकट

खरीफ सीजन की शुरुआत के बीच प्रदेश का किसान खाद, बीज, ऋण, बढ़ती लागत और विपणन संबंधी चुनौतियों से जूझते हुए समय पर संसाधनों की उपलब्धता की उम्मीद लगाए हुए है।

भोपाल, 23 जून।

खरीफ सीजन की दस्तक के साथ ही प्रदेश का किसान एक बार फिर उम्मीद और चिंता के दोराहे पर खड़ा है। अच्छी वर्षा के बाद खेतों में नमी है, बुवाई के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनी हुई हैं और किसान नई फसल के सपने संजो रहा है। लेकिन इस आशा के बीच एक कड़वी सच्चाई भी है। प्रदेश के अनेक हिस्सों में किसान खाद, बीज और समय पर ऋण जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है। कृषि प्रधान राज्य होने के बावजूद यदि किसान को खेती शुरू करने के लिए आवश्यक संसाधन समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

प्रदेश में खरीफ फसलों के लिए हर वर्ष बड़ी मात्रा में यूरिया, डीएपी और अन्य उर्वरकों की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद लगभग हर सीजन में खाद की उपलब्धता को लेकर संकट की स्थिति बन जाती है। अनेक स्थानों पर किसानों को घंटों कतारों में खड़ा रहना पड़ता है। कई बार उन्हें आवश्यक मात्रा में खाद नहीं मिल पाती और उन्हें बार-बार वितरण केंद्रों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। खेती में समय का विशेष महत्व होता है। बुवाई के उपयुक्त अवसर के निकल जाने का अर्थ सीधे उत्पादन में कमी और आर्थिक नुकसान से है। इसलिए खाद की उपलब्धता केवल आपूर्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि कृषि उत्पादन और किसान की आय से जुड़ा मुद्दा है।

बीजों की उपलब्धता और उनकी गुणवत्ता को लेकर भी किसानों की चिंताएं कम नहीं हैं। प्रमाणित और गुणवत्तापूर्ण बीज समय पर उपलब्ध नहीं हो पाते, जबकि निजी कंपनियों के बीज अपेक्षाकृत अधिक कीमत पर बिकते हैं। किसान बेहतर उत्पादन की उम्मीद में महंगे बीज खरीदता है, लेकिन मौसम की प्रतिकूलता, कीट प्रकोप या अन्य कारणों से फसल प्रभावित होने पर उसकी पूरी आर्थिक गणना बिगड़ जाती है। ऐसे में जोखिम का अधिकांश भार किसान के कंधों पर ही आ जाता है।

कृषि ऋण व्यवस्था की जटिलताएं भी किसानों की परेशानी बढ़ा रही हैं। संस्थागत ऋण उपलब्ध कराने की अनेक योजनाएं होने के बावजूद अनेक किसानों को समय पर ऋण नहीं मिल पाता। दस्तावेजी प्रक्रियाएं, प्रशासनिक विलंब और विभिन्न औपचारिकताएं अक्सर बुवाई के महत्वपूर्ण समय को प्रभावित कर देती हैं। परिणामस्वरूप कई किसान निजी साहूकारों या गैर-संस्थागत स्रोतों से ऊंची ब्याज दरों पर ऋण लेने के लिए विवश हो जाते हैं। इससे उनकी आर्थिक स्थिति और अधिक कमजोर होती है।

खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। उर्वरक, बीज, कीटनाशक, डीजल, बिजली और मजदूरी पर होने वाला खर्च पहले की तुलना में काफी अधिक हो चुका है। इसके विपरीत किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित नहीं हो पाता। न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा अवश्य होती है, लेकिन खरीद व्यवस्था की व्यावहारिक चुनौतियां किसानों को उसका पूरा लाभ लेने से रोकती हैं। कई बार किसानों को मजबूरी में अपनी उपज कम कीमत पर बेचनी पड़ती है।

कीटनाशकों और कृषि आदानों की गुणवत्ता भी चिंता का विषय है। नकली या निम्न गुणवत्ता वाले उत्पाद किसानों को आर्थिक नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ उत्पादन को भी प्रभावित करते हैं। शिकायतों के निराकरण में देरी और निगरानी तंत्र की कमजोरियां समस्या को और गंभीर बना देती हैं। इसी प्रकार सिंचाई और ऊर्जा से जुड़ी चुनौतियां भी किसानों की लागत बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

सरकारों ने किसानों के लिए अनेक योजनाएं शुरू की हैं, जिनका उद्देश्य उनकी आय बढ़ाना और जोखिम कम करना है। हालांकि इन योजनाओं का वास्तविक लाभ तभी संभव है जब उनका क्रियान्वयन समयबद्ध और प्रभावी ढंग से हो। फसल बीमा, कृषि ऋण, उर्वरक वितरण और समर्थन मूल्य जैसी व्यवस्थाओं को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है। तकनीक का उपयोग किसानों की सुविधा बढ़ाने के लिए होना चाहिए, न कि प्रक्रियाओं को और जटिल बनाने के लिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि कृषि को केवल योजनाओं और आंकड़ों के आधार पर न देखा जाए। खेतों की वास्तविक स्थिति, किसानों की चुनौतियों और स्थानीय आवश्यकताओं को समझकर नीतियां बनाई जाएं। खाद और बीज की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, ऋण प्रक्रिया को सरल बनाया जाए, कालाबाजारी पर सख्त कार्रवाई हो और फसल नुकसान की स्थिति में किसानों को शीघ्र राहत मिले। साथ ही कृषि विपणन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाकर किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना भी आवश्यक है।

किसान किसी विशेष अनुग्रह की अपेक्षा नहीं करता। वह केवल इतना चाहता है कि उसके श्रम का उचित सम्मान हो और खेती के लिए आवश्यक संसाधन समय पर उपलब्ध हों। देश की खाद्य सुरक्षा का आधार किसान है। यदि उसकी समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर नहीं किया गया तो इसका प्रभाव केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और समग्र विकास पर भी पड़ेगा। इसलिए समय की मांग है कि कृषि क्षेत्र की चुनौतियों को गंभीरता से लिया जाए और किसान को व्यवस्था के केंद्र में रखकर समाधान खोजे जाएं। तभी खेतों की हरियाली और किसानों की खुशहाली का सपना साकार हो सकेगा।

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