नई दिल्ली, 23 जून।
सोशल मीडिया ने दुनिया को जोड़ने का काम किया है, लेकिन इसके साथ उसने एक ऐसी संस्कृति भी पैदा कर दी है, जिसमें व्यक्ति अपनी खुशियों और उपलब्धियों का मूल्य खुद नहीं, बल्कि दूसरों की प्रतिक्रियाओं से तय करने लगा है। आज किसी परीक्षा में सफलता मिले, नौकरी में प्रमोशन हो या कोई निजी उपलब्धि हासिल हो, उसे सोशल मीडिया पर साझा करना लगभग स्वाभाविक व्यवहार बन गया है। समस्या साझा करने में नहीं, बल्कि उस मानसिकता में है, जो खुशी को लाइक्स और कमेंट्स की संख्या से जोड़ देती है।
धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति आत्मसंतोष को कमजोर करती है। व्यक्ति अपनी सफलता का आनंद लेने के बजाय यह देखने में अधिक व्यस्त हो जाता है कि कितने लोगों ने उसे नोटिस किया। परिणाम यह होता है कि उपलब्धियां स्थायी संतोष देने के बजाय क्षणिक उत्साह का साधन बन जाती हैं। डिजिटल दुनिया की तालियां थमते ही खुशी भी फीकी पड़ने लगती है।
यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का संकेत है। आज प्रदर्शन की संस्कृति ने जीवन के हर क्षेत्र में जगह बना ली है। लोग सफल होने से अधिक सफल दिखने की चिंता करने लगे हैं। तुलना, प्रतिस्पर्धा और मान्यता की यह दौड़ मानसिक तनाव, असंतोष और आत्मसम्मान के संकट को जन्म दे रही है।
वास्तविक उपलब्धि का मूल्य किसी एल्गोरिद्म या दर्शक संख्या से तय नहीं हो सकता। सफलता की असली कसौटी व्यक्ति का प्रयास, संघर्ष और सीख है। समाज को भी ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी, जहां व्यक्तित्व की पहचान डिजिटल लोकप्रियता से नहीं, बल्कि वास्तविक योगदान और मानवीय मूल्यों से हो।
लाइक्स खुशी दे सकते हैं, लेकिन आत्मविश्वास नहीं। आत्मसम्मान का सबसे मजबूत आधार दूसरों की स्वीकृति नहीं, बल्कि स्वयं की स्वीकृति होती है। जिस दिन यह बात समझ में आ जाएगी, उस दिन खुशी स्क्रीन पर नहीं, मन के भीतर दिखाई देगी।









