निगम, मंडल और आयोगों में नई ताजपोशी के बाद कामकाज शुरू हो चुका है। मगर एक बड़े निगम के नए साहब की नजर अभी भी कुर्सी से ज्यादा कुर्सी के आसपास घूम रही है।
वजह साफ है—ऐसा भरोसेमंद सहयोगी चाहिए, जो काम भी संभाले और साहब की छवि पर धूल का एक कण भी न जमने दे।















