नई दिल्ली, 29 जून।
मनुष्य के जीवन के लिए दवाएं उतनी ही जरूरी हैं, जितना पानी और हवा। बिना दवा के बीमारी का उपचार संभव नहीं है। लेकिन जब दवा अपना काम पूरा कर लेती है या उसकी एक्सपायरी तिथि निकल जाती है, तो वही दवा, जो जीवन बचाती है, पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन जाती है। घरों में बची हुई सिरप, टैबलेट, कैप्सूल, इंजेक्शन और मरहम का निस्तारण एक गंभीर समस्या बन चुका है। अधिकांश लोग बची हुई दवाओं को कचरे में फेंक देते हैं या शौचालय में बहा देते हैं। कुछ लोग उन्हें जला देते हैं, जबकि बहुत कम लोग यह जानते हैं कि दवाओं का गलत निस्तारण जल, मिट्टी और वायु प्रदूषण का कारण बन रहा है।
दवाओं में रासायनिक तत्व होते हैं, जो शरीर को ठीक करने के लिए बनाए जाते हैं। जब दवा एक्सपायर हो जाती है, तो उसके रासायनिक घटक टूटने लगते हैं और वे विषैले पदार्थों में बदल सकते हैं। ऐसी दवा यदि गलती से किसी व्यक्ति या पशु के शरीर में चली जाए, तो गंभीर बीमारी या मृत्यु भी हो सकती है। इसी कारण दवाओं की पैकेजिंग पर एक्सपायरी तिथि स्पष्ट रूप से लिखी जाती है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अधिकांश लोग तिथि देखे बिना ही दवा खा लेते हैं या पुरानी दवा का दोबारा उपयोग कर लेते हैं। घरों के मेडिसिन बॉक्स में रखी दवाएं अक्सर पांच-दस वर्ष पुरानी हो जाती हैं और कोई भी उन्हें फेंकने की जहमत नहीं उठाता।
देश में दवाओं के संग्रह और निस्तारण की कोई व्यवस्थित प्रणाली नहीं है। अस्पतालों और फार्मेसी से निकलने वाले बायोमेडिकल कचरे के लिए नियम बने हुए हैं, लेकिन घरों से निकलने वाली दवाओं के लिए कोई स्पष्ट नीति नहीं है। लोग बची हुई एंटीबायोटिक, दर्दनिवारक, मधुमेह और उच्च रक्तचाप की दवाएं कचरे के डिब्बे में फेंक देते हैं। कचरा उठाने वाले कर्मचारी जब उसे खुले में डालते हैं, तो वर्षा का पानी उन दवाओं को बहाकर नदी-नालों और जमीन तक पहुंचा देता है। रासायनिक दवाएं मिट्टी में मिलकर फसलों को प्रभावित करती हैं और भूजल में घुलकर पीने के पानी को दूषित करती हैं। शोध बताते हैं कि नदियों में एंटीबायोटिक के अंश मिलने से बैक्टीरिया दवा-प्रतिरोधी बन रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि भविष्य में साधारण संक्रमण का इलाज भी कठिन हो सकता है।
शौचालय में दवा बहाने की आदत भी उतनी ही खतरनाक है। लोग सोचते हैं कि फ्लश करने से दवा समाप्त हो जाएगी, लेकिन सच्चाई यह है कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भी दवाओं के रसायनों को पूरी तरह साफ नहीं कर पाते। ये रसायन नदियों और तालाबों में पहुंचकर मछलियों और अन्य जलीय जीवों को नुकसान पहुंचाते हैं। कुछ दवाएं हार्मोन को प्रभावित करती हैं, जिससे मछलियों की प्रजनन क्षमता घट जाती है। जलचर प्राणियों पर इसका असर अंततः मनुष्य पर भी पड़ता है, क्योंकि हम उसी पानी और उसी खाद्य श्रृंखला का हिस्सा हैं।
दवाओं को जलाने से भी समस्या का समाधान नहीं होता। दवाओं की प्लास्टिक पैकेजिंग और रसायन जलने पर जहरीली गैसें निकलती हैं, जो फेफड़ों और त्वचा के लिए हानिकारक होती हैं। खुले में जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है और बच्चों तथा बुजुर्गों में सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग पुरानी दवाओं को गड्ढा खोदकर दबा देते हैं, लेकिन प्लास्टिक और रसायन मिट्टी में सैकड़ों वर्षों तक बने रहते हैं और धीरे-धीरे भूजल में घुलते रहते हैं।
इन सभी समस्याओं का समाधान जन-जागरूकता और व्यवस्थित निस्तारण प्रणाली में है। सबसे पहले लोगों को यह समझना होगा कि दवा केवल डॉक्टर की सलाह पर ही लेनी चाहिए। बिना पर्चे के दवा खरीदने की आदत छोड़नी होगी। जितनी जरूरत हो, उतनी ही दवा खरीदें, ताकि अतिरिक्त दवा बचने का प्रश्न ही न उठे। डॉक्टर की सलाह के अनुसार पूरा कोर्स करें और बीच में दवा बंद न करें, ताकि अतिरिक्त दवा घर में इकट्ठी न हो।
बची हुई दवाओं को सुरक्षित तरीके से लौटाने की व्यवस्था भी आवश्यक है। कई देशों में 'टेक-बैक प्रोग्राम' चलते हैं, जहां लोग पुरानी और एक्सपायर दवाएं फार्मेसी या अस्पताल में जमा कर सकते हैं। भारत में भी कुछ शहरों में ड्रग डिस्पोजल बॉक्स लगाए जा रहे हैं, जहां लोग बिना नाम बताए दवाएं जमा कर सकते हैं। स्कूल, कॉलेज और पंचायत स्तर पर दवा निस्तारण की जानकारी दी जाए, तो लोग अधिक जागरूक होंगे। दवाओं को बच्चों और पालतू जानवरों की पहुंच से दूर रखें। निस्तारण से पहले टैबलेट को कूटकर राख में मिलाकर सीलबंद डिब्बे में फेंकें, सिरप को कागज या मिट्टी में सोखकर फेंकें तथा इंजेक्शन, सुई और अन्य नुकीली वस्तुओं को पंचर-प्रूफ कंटेनर में डालें।
फार्मा कंपनियों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग तैयार करें और मरीजों को दवाओं के साथ उनके सुरक्षित निस्तारण के निर्देश भी दें। सरकार को घरेलू दवा कचरे के लिए स्पष्ट नीति बनानी चाहिए और नगर निगम को प्रत्येक वार्ड में दवा संग्रह केंद्र स्थापित करने चाहिए। आशा कार्यकर्ता और स्वास्थ्य कर्मी घर-घर जाकर लोगों को बताएं कि दवा का कचरा सामान्य कचरा नहीं है। आयुर्वेद और होम्योपैथी की दवाएं भी रासायनिक प्रभाव रखती हैं, इसलिए उनका निस्तारण भी समान सावधानी से किया जाना चाहिए।
दवा जीवनरक्षक है, लेकिन बेकार या एक्सपायर दवा जीवन और पर्यावरण, दोनों के लिए खतरा है। जब तक हम दवा के उपयोग और उसके निस्तारण के प्रति जिम्मेदार नहीं बनेंगे, तक तक नदियां प्रदूषित होती रहेंगी, मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती रहेगी और बीमारियां बढ़ती रहेंगी। एक छोटी-सी सावधानी से हम बहुत बड़ा नुकसान रोक सकते हैं। डॉक्टर की सलाह से दवा लें, निर्धारित मात्रा में लें, पूरा कोर्स करें और बची हुई दवा को सामान्य कचरे में फेंकने के बजाय सुरक्षित संग्रह केंद्र में जमा करें। क्योंकि स्वस्थ शरीर के साथ स्वस्थ पर्यावरण भी उतना ही जरूरी है और दोनों की रक्षा हमारे ही हाथ में है।















