काठमांडू, 29 जून।
नेपाल की पूर्व राष्ट्रपति विद्या भंडारी ने देश की मौजूदा शासन व्यवस्था को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नेपाल जैसे विविधताओं से भरे राष्ट्र के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी प्रणाली बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं है।
दिवंगत नेता मदन भंडारी की 75वीं जयंती पर आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि देश की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना ऐसी प्रणाली का समर्थन नहीं करती है। उन्होंने मौजूदा शासन ढांचे को बरकरार रखने की वकालत की।
पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि संवैधानिक संशोधन पर व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर चर्चा संभव है। हालांकि, बहुजातीय और बहुभाषी नेपाल में सीधे जनता द्वारा चुने गए कार्यकारी प्रमुख का मॉडल प्रासंगिक नहीं होगा।
लोकतंत्र के मायने समझाते हुए उन्होंने कहा कि महज चुनाव जीतना ही काफी नहीं है। शासन में कानूनी शासन और सार्वजनिक जवाबदेही का होना निरंतर जरूरी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कम्युनिस्ट दलों को हालिया चुनावी परिणामों से आत्ममंथन करना चाहिए।
उन्होंने चेताया कि किसी एक चुनाव के आधार पर कम्युनिस्ट आंदोलन के भविष्य पर जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना चाहिए। उन्होंने पार्टी के भीतर रचनात्मकता की कमी को बड़ी चुनौती करार दिया है।
भंडारी ने कहा कि जनता के घटते विश्वास को स्वीकार करना होगा। उन्होंने माना कि संगठन और कार्यशैली में नवाचार की कमी के कारण नीतियां जन-आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं रहीं।
युवा पीढ़ी की अपेक्षाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने रोजगार, सुशासन और शिक्षा के क्षेत्र में नई सोच अपनाने को कहा। उन्होंने देश को समृद्धि की राह पर ले जाने के लिए नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन को सबसे अनिवार्य बताया।















