भोपाल, 29 जून।
राजधानी में शिक्षा के नाम पर विद्यार्थियों की सुरक्षा से किया जा रहा समझौता बेहद चिंताजनक है। हालिया पड़ताल में सामने आया है कि शहर के लगभग 800 कोचिंग संस्थानों और छात्रावासों में गंभीर सुरक्षा खामियां हैं। कहीं अग्निशमन अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) नहीं है, कहीं आपातकालीन निकास बंद हैं, तो कहीं जर्जर बिजली व्यवस्था और अव्यवस्थित भवन किसी भी समय बड़े हादसे का कारण बन सकते हैं। इसके बावजूद कार्रवाई सीमित नोटिसों तक सिमटी हुई दिखाई देती है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि इतनी बड़ी संख्या में संस्थानों में सुरक्षा मानकों का उल्लंघन पाया गया है, तो कठोर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? विद्यार्थियों और अभिभावकों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। नगर निगम, जिला प्रशासन, पुलिस और अग्निशमन विभाग सभी की स्पष्ट भूमिका है, लेकिन यदि निरीक्षण के बाद भी खामियां जस की तस बनी रहती हैं, तो पूरी व्यवस्था की जवाबदेही तय होना स्वाभाविक है।
देश पहले भी ऐसे दर्दनाक हादसे देख चुका है, जिनमें सुरक्षा नियमों की अनदेखी ने कई मासूम जिंदगियां छीन लीं। इसलिए यह आवश्यक है कि किसी दुर्घटना का इंतजार करने के बजाय तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जाएं। जिन भवनों में गंभीर खतरे हैं, उन्हें नियमों के अनुरूप सुरक्षित होने तक संचालित नहीं होने दिया जाना चाहिए। नियमित सुरक्षा ऑडिट, अग्निशमन व्यवस्था की अनिवार्य जांच, छात्रावासों का सत्यापन और कार्रवाई की सार्वजनिक समीक्षा समय की मांग है।
हर वर्ष हजारों विद्यार्थी बेहतर भविष्य के सपने लेकर राजधानी आते हैं। उनकी सुरक्षा केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। यदि प्रशासन समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं करता, तो भविष्य में होने वाली किसी भी बड़ी दुर्घटना की जिम्मेदारी केवल लापरवाह संचालकों की ही नहीं, बल्कि उन विभागों की भी मानी जाएगी जिन्होंने चेतावनी के बावजूद समय पर कदम नहीं उठाए।














