साहब ने समय लगाया, संसाधन लगाए, कार्यक्रम किए, सामाजिक समरसता के मंच सजाए और यह भरोसा भी रखा कि मेहनत का इनाम एक दिन जरूर मिलेगा।
लेकिन जब इंतजार का फल नहीं मिला तो अब मुस्कुराकर यही कहते हैं—"हम तो बिना किसी लोभ-लालच के समाज सेवा कर रहे हैं।" राजनीतिक गलियारों में इसे लोग त्याग कम और तजुर्बा ज्यादा बता रहे हैं।















