मध्यप्रदेश, 9 जुलाई।
मध्यप्रदेश में हर हफ्ते एक नई मासूम जान चली जाती है। कभी कोई बच्चा खुले बोरवेल में गिर जाता है तो कभी किसी खुले कुएं में। हर हादसे के बाद वही घिसी-पिटी कहानी दोहराई जाती है—मुआवजे की घोषणा, जांच के आदेश और कुछ दिनों की हलचल। इसके बाद सब कुछ फिर सामान्य हो जाता है, मानो किसी की जान की कोई कीमत ही न हो। सच यह है कि ये प्राकृतिक दुर्घटनाएं नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही से होने वाली मौतें हैं।
प्रदेश में वर्ष 2023 के सर्वे में 3,045 कुएं असुरक्षित पाए गए थे। इनमें अधिकांश पर सुरक्षा के लिए मुंडेर तक नहीं थी। रिपोर्ट तैयार हुई, बैठकों का दौर चला, निर्देश जारी हुए, लेकिन जमीन पर हालात नहीं बदले। वर्ष 2026 तक भी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई देता। सवाल यह है कि आखिर सुरक्षा जैसे बुनियादी कार्य को पूरा करने में इतनी देरी क्यों हो रही है?
शहडोल, रायसेन, झाबुआ, सिवनी और प्रदेश के कई अन्य जिलों में एक जैसी तस्वीर दिखाई देती है। बोरवेल खोदे जाते हैं, काम पूरा होने के बाद उन्हें खुला छोड़ दिया जाता है और जिम्मेदार एजेंसियां आंखें मूंद लेती हैं। पंचायत, ठेकेदार और संबंधित विभाग अपनी-अपनी जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालते रहते हैं। इस लापरवाही की सबसे बड़ी कीमत उन परिवारों को चुकानी पड़ती है, जिनके घर का मासूम हमेशा के लिए उनसे बिछड़ जाता है।
इतना बड़ा प्रशासनिक ढांचा, पर्याप्त बजट और हजारों कर्मचारियों के बावजूद यदि एक खुले कुएं पर मजबूत मुंडेर भी नहीं बनाई जा सकती, तो यह केवल संसाधनों की नहीं बल्कि इच्छाशक्ति की कमी है। अक्सर तब तक कोई कार्रवाई नहीं होती, जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाए या मीडिया का कैमरा मौके पर न पहुंच जाए। हादसे के बाद संवेदना जताना आसान है, लेकिन उन्हें रोकने के लिए समय रहते कदम उठाना ही वास्तविक जिम्मेदारी है।
मुआवजा किसी मासूम की जिंदगी की भरपाई नहीं कर सकता। जांच समितियां तभी सार्थक होंगी, जब उनकी रिपोर्ट के आधार पर दोषियों पर ठोस कार्रवाई हो। जवाबदेही तय किए बिना ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना संभव नहीं है। जिस अधिकारी, इंजीनियर, ठेकेदार या पंचायत की लापरवाही से किसी की जान गई हो, उसके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
आज देश आधुनिक तकनीक, तेज रफ्तार परिवहन और विकास के नए आयामों की बात कर रहा है, लेकिन यदि गांवों में बच्चे सुरक्षित नहीं हैं तो विकास के दावों पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी सबसे कमजोर और सबसे मासूम आबादी की सुरक्षा से होती है।
सरकार को अब प्रतीकात्मक घोषणाओं से आगे बढ़ना होगा। प्रदेश के सभी खुले बोरवेल और असुरक्षित कुओं का समयबद्ध सर्वे कराया जाए, उन्हें तत्काल सुरक्षित किया जाए और पूरी प्रक्रिया की सार्वजनिक निगरानी सुनिश्चित की जाए। साथ ही, भविष्य में किसी भी ऐसी घटना पर संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाए। मासूमों की मौतें आंकड़े नहीं हैं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रमाण हैं। अब समय आ गया है कि खुले कुएं ही नहीं, प्रशासनिक लापरवाही के उन सभी रास्तों को भी हमेशा के लिए बंद किया जाए, जो हर वर्ष कई परिवारों की खुशियां निगल जाते हैं।














