प्रयागराज, 18 जुलाई।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वाराणसी के एक चर्चित दुष्कर्म मामले में अहम फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा दोषी को दी गई आजीवन कारावास की सजा को घटाकर जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया है। न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने अपील पर सुनवाई करते हुए आरोपी सुनील को आईपीसी की गंभीर धाराओं से बरी कर दिया, हालांकि उसे पोक्सो एक्ट के तहत दोषी माना।
मामला 7 सितंबर 2017 का है, जब रोहनिया थाना क्षेत्र में पांच वर्षीय बच्ची के पिता ने आरोपी पर छत पर ले जाकर गलत हरकत करने का आरोप लगाया था। विशेष सत्र न्यायालय ने 17 जून 2022 को आरोपी को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की कहानी में कई विसंगतियां पाईं। मेडिकल जांच में बच्ची के शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं मिले और फॉरेंसिक रिपोर्ट भी पेश नहीं की गई थी।
अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष बच्ची के साथ 'पेनिट्रेशन' (प्रवेशन) का आरोप संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। साथ ही, धारा 164 के तहत दर्ज बयानों में देरी और उसमें सुधार किए जाने को अदालत ने संदेहास्पद माना। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि प्रवेशन साबित नहीं हुआ, लेकिन बच्ची के साथ गलत हरकत करना यौन आशय से किया गया कृत्य माना जा सकता है। इसके चलते आरोपी को पोक्सो एक्ट की धारा 10 का दोषी ठहराया गया। आरोपी पांच वर्ष आठ माह की जेल काट चुका है, इसलिए कोर्ट ने उसे उसी अवधि की सजा सुनाते हुए तत्काल रिहाई के आदेश दिए हैं।












