संपादकीय
18 Jul, 2026

हिट एंड रन में एमपी टॉप: आधे पीड़ित अब भी मुआवजे को तरस रहे

मध्य प्रदेश में हिट एंड रन मामलों में देश में सबसे अधिक घटनाएं दर्ज होने के बावजूद आधे से ज्यादा पीड़ित परिवार अब भी सरकारी मुआवजे के इंतजार में हैं, जिससे सड़क सुरक्षा और राहत व्यवस्था दोनों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

भोपाल, 18 जुलाई।

मध्य प्रदेश की सड़कों पर मौत का सफर थमने का नाम नहीं ले रहा। यहां हर दिन सैकड़ों हादसे होते हैं। इनमें सबसे खतरनाक हिट एंड रन के मामले हैं। टक्कर मारकर भाग जाना अब आम बात हो गई है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस मामले में मध्य प्रदेश पूरे देश में पहले नंबर पर है। सबसे दुखद बात यह है कि हादसों के शिकार लोगों को सरकार से मिलने वाली मदद भी नहीं मिल पा रही। वर्ष 2020 से 2024 तक मध्य प्रदेश में 60 हजार से अधिक हिट एंड रन के मामले दर्ज किए गए। दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र है, जहां 38 हजार मामले दर्ज हुए। यानी देश में हुए कुल 3 लाख 15 हजार हिट एंड रन मामलों में से करीब 19 प्रतिशत अकेले मध्य प्रदेश में हुए।

पिछले पांच वर्षों से प्रदेश इस सूची में शीर्ष पर बना हुआ है। हर साल हादसों की संख्या बढ़ रही है। सड़कों पर रफ्तार और लापरवाही लोगों की जान ले रही है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 में हिट एंड रन पीड़ितों के लिए नई योजना शुरू की थी। योजना के तहत हादसे में मौत होने पर दो लाख रुपये और गंभीर चोट पर 50 हजार रुपये की सहायता दी जाती है। इस सहायता का मकसद पीड़ित परिवार को तुरंत राहत देना था, लेकिन मध्य प्रदेश में यह योजना कागजों तक ही सीमित रह गई। पिछले चार वर्षों में 1,234 दावे किए गए। इनमें से सिर्फ 592 दावों का ही भुगतान हो सका। यानी आधे से ज्यादा पीड़ित अब भी मदद के इंतजार में हैं। वर्ष 2022-23 में 73 दावे आए, जिनमें 34 का भुगतान हुआ। वर्ष 2023-24 में 231 दावे आए, जिनमें 133 का भुगतान हुआ। वर्ष 2024-25 में 929 दावे दर्ज हुए। वर्ष 2025-26 में अब तक 425 नए दावे आ चुके हैं।

मुआवजा देने के मामले में मध्य प्रदेश सबसे पीछे है। बिहार में 82 प्रतिशत दावों का निपटारा हो गया, झारखंड में 76 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 75 प्रतिशत और गुजरात में 71 प्रतिशत दावे निपटाए गए। मध्य प्रदेश में यह आंकड़ा 47 प्रतिशत से भी कम है। मुआवजा मिलने में देरी के कई कारण हैं। सबसे बड़ी समस्या कागजी प्रक्रिया है। पुलिस रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और बीमा संबंधी दस्तावेज तैयार होने में महीनों लग जाते हैं। ग्रामीण इलाकों के लोग इन दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते थक जाते हैं। हिट एंड रन मामलों में गाड़ी और चालक का पता नहीं चलता। ऐसे में बीमा कंपनी भुगतान करने से इन्कार कर देती है। अधिकारियों की लापरवाही भी एक बड़ा कारण है। फाइलें एक मेज से दूसरी मेज तक घूमती रहती हैं। कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होता।

सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ इसके कई कारण गिनाते हैं। तेज रफ्तार, हाईवे और शहरों की सड़कों पर गति सीमा का प्रभावी पालन न होना, शराब पीकर वाहन चलाना, मोबाइल पर बात करते हुए ड्राइविंग करना तथा पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित व्यवस्था का अभाव प्रमुख कारण हैं। मध्य प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में सड़कों का जाल तेजी से बढ़ा है, लेकिन सड़क सुरक्षा के इंतजाम उसी अनुपात में नहीं बढ़े। स्पीड कैमरों, ट्रैफिक पुलिस और जनजागरूकता की कमी साफ दिखाई देती है।

हिट एंड रन में मरने वाले के परिवार पर दोहरी मार पड़ती है। पहले घर का कमाने वाला चला जाता है, फिर मुआवजे के लिए वर्षों तक भटकना पड़ता है। कई परिवार कर्ज लेकर अंतिम संस्कार करते हैं। उन्हें लगता है कि सरकार से मदद मिल जाएगी, लेकिन जब मदद नहीं मिलती तो भूख और कर्ज दोनों का बोझ बढ़ जाता है। महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। राज्य सरकार ने सड़क सुरक्षा को लेकर कई अभियान चलाए। स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम हुए, हेलमेट और सीट बेल्ट को लेकर चालान भी किए गए। मुआवजे के लिए ऑनलाइन पोर्टल भी बनाया गया, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। गांव के लोगों को पोर्टल की जानकारी नहीं है। वे तहसील और कलेक्ट्रेट के चक्कर काट रहे हैं। अधिकारियों को लक्ष्य नहीं दिया गया है, इसलिए फाइलें धीमी गति से चल रही हैं।

सड़क सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। हर हाईवे और शहर में स्पीड गन तथा सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं। शराब पीकर वाहन चलाने वालों का लाइसेंस तुरंत रद्द हो। हर जिले में सड़क सुरक्षा सेल बनाया जाए। मुआवजे के दावों के निपटारे की समय-सीमा 30 दिन तय हो। देरी करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो। सबसे जरूरी है जनजागरूकता। लोगों को बताया जाए कि हादसा होने पर घायल को छोड़कर भागना अपराध है। घायल को अस्पताल पहुंचाना कानूनन जरूरी है।

सड़क हादसे सिर्फ जान ही नहीं लेते, बल्कि अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाते हैं। एक युवा की मौत का मतलब है परिवार की आय का स्रोत खत्म होना। अस्पताल का खर्च अलग। सरकार का मुआवजा न देना इस घाव को और गहरा करता है। यदि 1,234 में से 592 लोगों को ही मदद मिली है, तो 642 परिवार अब भी दर-दर भटक रहे हैं। यह आंकड़ा छोटा नहीं है। सरकार के साथ समाज की भी जिम्मेदारी है। ड्राइविंग करते समय मोबाइल का उपयोग न करें, नशे में वाहन न चलाएं और ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन न करें। मीडिया, स्कूल और पंचायतें मिलकर लोगों को जागरूक करें। तभी हादसों की संख्या कम होगी।

मध्य प्रदेश के लिए यह आंकड़ा शर्मनाक है। हम हिट एंड रन में नंबर वन हैं और मुआवजा देने में सबसे पीछे। हर आंकड़े के पीछे एक परिवार की कहानी है, एक टूटा हुआ घर है। सरकार को तुरंत इस पर ध्यान देना चाहिए। प्रक्रिया सरल होनी चाहिए, जवाबदेही तय होनी चाहिए और पीड़ित को उसका हक समय पर मिलना चाहिए। वरना हर साल हजारों लोग सड़क पर जान गंवाते रहेंगे और उनके परिवार मुआवजे के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाते रहेंगे। मध्य प्रदेश को इस सूची में शीर्ष से नीचे आना होगा। तभी हम कह सकेंगे कि हमारा प्रदेश सच में विकास कर रहा है।

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