लखनऊ, 24 जुलाई।
राजधानी के स्वास्थ्य केंद्रों पर क्षय रोग के निदान को लेकर डॉक्टरों ने बड़ी चेतावनी जारी की है, जिसके तहत महज एक्स-रे रिपोर्ट और लक्षणों के आधार पर टीबी का उपचार शुरू करना मरीजों के लिए घातक साबित हो रहा है। सिविल अस्पताल में ऐसे कई हैरान करने वाले प्रकरण प्रकाश में आए हैं, जहां पीड़ित को बीमारी न होने पर भी दवाएं दी गईं, जबकि वास्तविक संक्रमण के शिकार लोगों का दूसरी बीमारियों के नाम पर गलत इलाज चलता रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि सटीक पुष्टि के लिए बलगम परीक्षण और सीटी स्कैन जैसी विस्तृत जांच बेहद आवश्यक है।
शहर के अहिमामऊ के रहने वाले प्रेमचंद को सांस लेने में दिक्कत व खांसी आने पर एक निजी चिकित्सक ने फेफड़ों में धब्बे देखकर टीबी की दवा लिख दी थी, लेकिन सुधार न होने पर जब सिविल अस्पताल में गहन परीक्षण कराया गया तब पता चला कि उन्हें टीबी नहीं बल्कि लंग नोड्यूल की समस्या थी। वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. आशुतोष दुबे के अनुसार लगभग तीस प्रतिशत मामलों में केवल छाती के छायाचित्र से किया गया आकलन भ्रामक होता है, क्योंकि कई बीमारियों के लक्षण आपस में मिलते-जुलते होते हैं।
हालांकि अस्पताल में हर माह सैकड़ों नए रोगी सामने आते हैं, जिनमें से समय पर उपचार मिलने के कारण अधिकांश लोग पूरी तरह स्वस्थ हो रहे हैं और प्रदेशभर में सफलता की यह दर नब्बे प्रतिशत से अधिक दर्ज की जा रही है। एक संक्रमित व्यक्ति उचित सावधानी न बरतने पर कई अन्य स्वस्थ नागरिकों को भी प्रभावित कर सकता है, इसलिए विशेषज्ञ बीच में कोर्स अधूरा छोड़ने से मना करते हैं क्योंकि इससे एमडीआर जैसी खतरनाक स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
जीवाणुओं की विभिन्न श्रेणियों का जिक्र करते हुए विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि कुछ बैक्टीरिया दवाओं के प्रति अधिक प्रतिरोधी होते हैं जो प्रतिकूल वातावरण में महीनों तक जीवित रह सकते हैं और हवा के जरिए तेजी से फैलते हैं। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में इस बीमारी के सर्वाधिक आंकड़े दर्ज किए जाते हैं, जहां प्रशासन द्वारा विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। लोहिया संस्थान जैसी आधुनिक संस्थाओं में अब ईबीयूएस जैसी अत्याधुनिक तकनीक के माध्यम से बिना किसी चीर-फाड़ के फेफड़ों की अंदरूनी तस्वीरें लेकर शुरुआती स्तर पर ही बीमारी की सटीक पहचान सुनिश्चित की जा रही है।















