उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारत में जन्म लेने वाले नागरिक को मतदाता सूची में शामिल होने और मतदान का अधिकार अविच्छेद्य है, जिससे लोकतांत्रिक भागीदारी और समावेशिता मजबूत होती है।
-राजेन्द्र कानूनगो
भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला ‘सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार’ पर टिकी है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक स्पष्टीकरण देते हुए यह रेखांकित किया है कि “जो भारत में पैदा हुआ है, वह भारत का नागरिक है और उसे मतदाता सूची में शामिल होने तथा मतदान करने का अविच्छेद्य अधिकार है।” यह टिप्पणी मात्र एक कानूनी बयान नहीं है, बल्कि यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 और नागरिकता अधिनियम, 1955 की आत्मा को पुनर्जीवित करने के समान है। ऐसे समय में जब नागरिकता, दस्तावेजों की वैधता और घुसपैठ जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहते हैं, सुप्रीम कोर्ट का यह रुख उन लाखों लोगों के लिए सुरक्षा कवच जैसा है, जिनकी भारतीयता केवल कागजों की कमी के कारण संदेह के घेरे में आ रही है।
भारतीय नागरिकता के कानून वैश्विक स्तर पर दो प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित रहे हैं, जिनमें जन्म के स्थान के आधार पर अधिकार और रक्त संबंधों या वंश के आधार पर अधिकार शामिल हैं। आजादी के समय, हमारे संविधान निर्माताओं ने ‘जस सोली’ को प्राथमिकता दी थी। इसका अर्थ था कि भारत की मिट्टी पर जन्म लेने वाला हर व्यक्ति, चाहे उसकी पृष्ठभूमि कुछ भी हो, इस राष्ट्र का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट की हाल की टिप्पणी इसी समावेशी दर्शन को दोहराती है।
हालांकि ‘पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज’ बनाम भारत संघ जैसे मामलों में कोर्ट ने मतदान को एक ‘सांविधिक अधिकार’ माना है, लेकिन इसे अभिव्यक्ति की आजादी (अनुच्छेद 19) के साथ जोड़कर भी देखा जाता है। जब कोर्ट यह कहता है कि भारत में जन्मे व्यक्ति को मतदान का अधिकार है, तो उसका स्पष्ट आशय यह होता है कि नागरिकता और मताधिकार एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना मताधिकार के नागरिकता एक ‘बेजान शब्द’ बनकर रह जाती है।
अक्सर प्रशासनिक स्तर पर छोटी-छोटी त्रुटियों या पुराने दस्तावेजों के अभाव में लोगों को ‘संदिग्ध मतदाता’ की श्रेणी में रख दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल प्रक्रियात्मक खामियों के आधार पर किसी ऐसे व्यक्ति को मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता, जिसका जन्म भारत में हुआ है।
कोर्ट का यह निर्देश निर्वाचन आयोग को अपनी कार्यप्रणाली अधिक मानवीय और सटीक बनाने का संकेत देता है। मतदाता सूची में नाम जोड़ना केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक नागरिक को उसके राजनीतिक अस्तित्व का बोध कराना है। कई मामलों में देखा गया है कि गरीब और अशिक्षित तबकों के पास अस्पताल के जन्म प्रमाण पत्र नहीं होते। कोर्ट की मंशा यह है कि यदि कोई व्यक्ति यह सिद्ध कर देता है कि उसका जन्म भारत में हुआ है, तो उसे राज्य की शक्ति का उपयोग करके नागरिकता विहीन नहीं बनाया जाना चाहिए।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने कहा था कि “मताधिकार एक ऐसा हथियार है जो आपको राजनीतिक शक्ति के बराबर लाता है।” अतः यह समझना आवश्यक है कि मतदान का अधिकार मिलने का वास्तविक अर्थ क्या है। इसका अर्थ है कि जब एक व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में होता है, तो वह सरकार से सवाल पूछने का हकदार बन जाता है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जन्म के आधार पर मताधिकार यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी समुदाय खुद को हाशिए पर महसूस न करे।
मतदान की प्रक्रिया व्यक्ति को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ती है। सुप्रीम कोर्ट के इस प्रगतिशील रुख के बावजूद, धरातल पर कई चुनौतियां मौजूद हैं, जैसे कि दस्तावेजीकरण की जटिलता। भारत के ग्रामीण इलाकों में आज भी जन्म का पंजीकरण शत-प्रतिशत नहीं हो पाता है। ऐसे में ‘भारत में जन्म’ सिद्ध करना एक कठिन कार्य हो जाता है। अक्सर मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण को राजनीतिक लाभ-हानि से जोड़कर देखा जाता है, जिससे वास्तविक नागरिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं। नागरिकों को यह पता ही नहीं होता कि उनके पास ‘जन्म के आधार पर’ नागरिकता के क्या अधिकार हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को प्रभावी बनाने के लिए कुछ कदम उठाए जाने चाहिए। मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया को इतना सरल बनाया जाना चाहिए कि जन्म के आधार पर सत्यापन सुगम हो सके। यदि नागरिकता पर कोई विवाद हो, तो प्राथमिक दृष्टिकोण नागरिक के पक्ष में होना चाहिए, जब तक कि ठोस साक्ष्य इसके विपरीत न हों। साथ ही नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायतों को जन्म पंजीकरण के प्रति अधिक सक्रिय होना होगा, ताकि भविष्य में किसी भी युवा को अपने मताधिकार के लिए न्यायालय का दरवाजा न खटखटाना पड़े।
यह ध्यान देना भी महत्वपूर्ण है कि 1955 के अधिनियम में 1987, 2003 और बाद में कई संशोधन हुए, जिन्होंने ‘जन्म द्वारा नागरिकता’ की शर्तों को कठिन बनाया, जैसे कि माता-पिता दोनों में से एक का भारतीय होना अनिवार्य करना। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत है, जो पीढ़ियों से यहीं रह रहे हैं और जिनके पास भारत के अलावा कोई दूसरा घर नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि संविधान की मूल भावना को तकनीकी संशोधनों से ऊपर रखा जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ और उसके लोकतांत्रिक मूल्यों की विजय है। यह संदेश देता है कि भारत एक ‘संवैधानिक लोकतंत्र’ है, जहां अधिकारों का स्रोत जन्म और मिट्टी से जुड़ाव है, न कि केवल नौकरशाही के जटिल कागजात। मतदाता सूची में नाम होना केवल चुनाव के दिन एक बटन दबाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक घोषणा है कि व्यक्ति इस देश की नियति का निर्माता है। यदि कोई व्यक्ति भारत की हवा में पहली सांस लेता है और इसी मिट्टी में बड़ा होता है, तो उसे अपने प्रतिनिधि चुनने से रोकना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि अनैतिक भी है।
अतः यह कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी निर्वाचन आयोग और सरकारों के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत है, ताकि वे सुनिश्चित करें कि कोई भी पात्र भारतीय नागरिक ‘अदृश्य’ न रह जाए। भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब ‘अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति’ का हाथ भी वोटिंग मशीन तक सुरक्षित पहुंचेगा। अतः जन्म का अधिकार ही मताधिकार का प्राथमिक आधार है, संवैधानिक नैतिकता प्रशासनिक जटिलताओं से ऊपर है, निर्वाचन आयोग को पंजीकरण प्रक्रिया में सुधार करना चाहिए और नागरिकता का अर्थ केवल निवास नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदारी है।