संपादकीय
14 Mar, 2026

कर्ज के बोझ तले विकास का रास्ता: मध्यप्रदेश की आर्थिक चुनौती

मध्यप्रदेश पर 5 लाख करोड़ रुपये का कर्ज, बजट से अधिक देनदारियां। विकास परियोजनाओं के बावजूद वित्तीय संतुलन चुनौतीपूर्ण। आर्थिक सुधार और निवेश पर ध्यान जरूरी।

मध्यप्रदेश को अक्सर तेजी से विकास करने वाले राज्यों में गिना जाता है। सड़क, पुल, अस्पताल, स्मार्ट सिटी, मेट्रो और अन्य बुनियादी ढांचे के निर्माण के बड़े-बड़े दावे सरकार की उपलब्धियों के रूप में सामने रखे जाते हैं। लेकिन इन दावों के पीछे एक गंभीर आर्थिक सच्चाई भी छिपी हुई है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार मध्यप्रदेश पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है और राज्य की वित्तीय स्थिति चिंता का विषय बनती जा रही है। विकास की दौड़ में आगे बढ़ते हुए राज्य अब कर्ज के दबाव में हांफता हुआ दिखाई दे रहा है।
वर्तमान स्थिति यह है कि मध्यप्रदेश पर कुल कर्ज लगभग 5 लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंच चुका है। दूसरी ओर वर्ष 2026-27 के लिए राज्य का अनुमानित कुल बजट करीब 4 लाख 48 हजार करोड़ रुपये है। यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि राज्य की कुल देनदारियां उसके वार्षिक बजट से भी अधिक हो चुकी हैं। किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए यह संकेत सामान्य नहीं माना जाता, क्योंकि इससे भविष्य में वित्तीय दबाव बढ़ने की संभावना रहती है।
एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट के अनुसार देश के 18 बड़े राज्यों में कर्ज चुकाने की क्षमता के मामले में मध्यप्रदेश दसवें स्थान पर है, जबकि कर्ज प्रबंधन और ऋण स्थिरता के पैमाने पर राज्य को सबसे कम दो अंक प्राप्त हुए हैं। इसका अर्थ यह है कि राज्य की आर्थिक वृद्धि और कर्ज के बोझ के बीच संतुलन बिगड़ता जा रहा है। जब किसी राज्य की आय की तुलना में ब्याज भुगतान तेजी से बढ़ता है, तो यह स्थिति वित्तीय असंतुलन की ओर इशारा करती है।
चिंता का सबसे बड़ा कारण यह है कि राज्य की आय का बड़ा हिस्सा केवल ब्याज भुगतान में ही खर्च हो रहा है। सरकार को पुराने कर्जों का ब्याज चुकाने में भारी राशि लगानी पड़ रही है, जिसके कारण विकास के लिए उपलब्ध संसाधन सीमित हो जाते हैं। इसके अलावा वेतन, पेंशन और प्रशासनिक खर्च जैसे अनिवार्य व्यय भी बजट का बड़ा हिस्सा अपने आप ले लेते हैं। परिणामस्वरूप सरकार के पास नई योजनाओं और जनहित कार्यक्रमों के लिए अपेक्षाकृत कम संसाधन बचते हैं।
हालांकि इस पूरे परिदृश्य का एक सकारात्मक पहलू भी है। नीति से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार मध्यप्रदेश कर्ज लेकर उसे अनुत्पादक कार्यों में खर्च नहीं कर रहा है। कर्ज की गुणवत्ता के मामले में राज्य को 60.8 अंक प्राप्त हुए हैं और इस आधार पर वह देश में उड़ीसा और झारखंड के बाद तीसरे स्थान पर है। इसका मतलब है कि सरकार कर्ज का एक बड़ा हिस्सा सड़कों, पुलों, अस्पतालों और अन्य बुनियादी ढांचे के निर्माण जैसे पूंजीगत विकास कार्यों में लगा रही है। दीर्घकाल में ये परियोजनाएं राज्य की आर्थिक क्षमता को मजबूत कर सकती हैं।
फिर भी वास्तविक चुनौती यह है कि इन परियोजनाओं से तत्काल आय या राजस्व उतना नहीं आ रहा है जितनी उम्मीद की जाती है। स्मार्ट सिटी, मेट्रो, फ्लाईओवर और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर भारी निवेश हो रहा है, लेकिन उनसे आर्थिक लाभ धीरे-धीरे और लंबी अवधि में मिलता है। जब तक इनसे पर्याप्त आय उत्पन्न नहीं होती, तब तक कर्ज का दबाव बना रहता है।
राज्य के प्रशासनिक ढांचे में भी कई असंतुलन दिखाई देते हैं। कई विभागों में कर्मचारियों के रिटायर होने के बाद पद खाली पड़े हुए हैं और उनकी भर्ती समय पर नहीं हो पा रही है। इससे प्रशासनिक कार्यों पर असर पड़ता है। दूसरी ओर सरकार को पेंशन और अन्य सामाजिक दायित्वों का बोझ भी उठाना पड़ रहा है। इन सब कारणों से सरकारी खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है।
मध्यप्रदेश की वित्तीय स्थिति को समझने के लिए एक कहावत अक्सर सुनाई देने लगी है—“आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया।” इसका आशय यह है कि राज्य की आय के मुकाबले खर्च कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है। यदि यही स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो भविष्य में कर्ज का बोझ और बढ़ सकता है।
ऐसी परिस्थिति में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजस्व बढ़ाने और खर्चों को संतुलित करने की है। इसके लिए उद्योग, निवेश और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देना आवश्यक होगा ताकि राज्य की आय में वृद्धि हो सके। साथ ही, गैर-जरूरी खर्चों पर नियंत्रण और योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन पर भी ध्यान देना होगा। यह कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन इस विकास की गति को टिकाऊ बनाने के लिए वित्तीय अनुशासन बेहद जरूरी है। यदि कर्ज का प्रबंधन संतुलित तरीके से किया गया और विकास परियोजनाओं से अपेक्षित आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ, तो राज्य भविष्य में इस आर्थिक दबाव से बाहर निकल सकता है। अन्यथा कर्ज का बढ़ता बोझ विकास की रफ्तार को धीमा भी कर सकता है।
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