वाशिंगटन, 30 अक्टूबर।
देश में गरीबी के मोर्चे पर राहत देने वाली बड़ी खबर सामने आई है। वर्ष 2011 से 2023 के दौरान भारत में लगभग 49.6 करोड़ नागरिक निर्धनता से बाहर आए हैं। इस अवधि में भीषण निर्धनता का सामना कर रही आबादी का हिस्सा 27.1 प्रतिशत से सिमटकर महज 2.6 प्रतिशत पर पहुंच गया है। विश्व बैंक द्वारा जारी 'पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ' में इस अभूतपूर्व सुधार को वैश्विक स्तर पर निर्धनता में आई सबसे तेज गिरावटों में गिना गया है।
आंकड़ों के मुताबिक 2021 की क्रय शक्ति समानता के पैमाने पर रोजाना 4.20 डॉलर से कम कमाने वालों का आंकड़ा 57.7 फीसदी से घटकर 16.1 फीसदी पर आ गया है। इस दौरान वित्तीय और गैर-वित्तीय दोनों ही पैमानों पर स्थिति काफी सुधरी है। उपभोग में बढ़ोतरी, रोजगार के नए अवसरों और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने इस दिशा में अहम भूमिका निभाई है। साथ ही मुफ्त राशन जैसी सामाजिक सहायता योजनाओं ने भी गरीबों को बड़ा सहारा दिया है।
संभावना जताई गई है कि आने वाले समय में भी निर्धनता घटने का सिलसिला जारी रहेगा, हालांकि इसकी रफ्तार कुछ धीमी पड़ सकती है। 4.20 डॉलर रोजाना की आय सीमा के आधार पर गरीबी दर 2026 में 14.2 फीसदी से गिरकर 2028 तक 12.1 फीसदी पर आ सकती है। हालांकि नए आर्थिक और श्रम आंकड़ों के आगमन पर इन अनुमानों में संशोधन संभव है।
गैर-मौद्रिक यानी बहुआयामी निर्धनता के मोर्चे पर भी बड़ी कामयाबी मिली है। ऑक्सफोर्ड के बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार यह दर 2005-06 के 53.8 प्रतिशत से गिरकर 2019-21 में 16.4 प्रतिशत रह गई। वहीं विश्व बैंक के अपने पैमाने के तहत 2022-23 में यह आंकड़ा 15.5 फीसदी दर्ज किया गया था।
हालाँकि देश में क्षेत्रीय विषमताएं अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। भारत की कुल गरीब आबादी का लगभग 57 प्रतिशत हिस्सा उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक फैले पट्टीनुमा भूभाग में निवास करता है। इस वजह से इन राज्यों में बेहतर और उत्पादक काम के मौके पैदा करना बेहद जरूरी माना जा रहा है।
वर्ष 2017 से 2023 के बीच लगभग 13.4 करोड़ नए लोगों को रोजगार मिला, जो कामकाजी उम्र की आबादी में हुई वृद्धि से करीब दोगुना था। इसमें ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं का प्रवेश सबसे उल्लेखनीय रहा। इसके बावजूद युवाओं की बेरोजगारी दर वित्त वर्ष 2025-26 से 2026-27 की पहली तिमाहियों के बीच 14.6 प्रतिशत से बढ़कर 15.9 प्रतिशत हो गई, जिससे ग्रामीण युवा महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं।
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि वास्तविक कमाई में कोई बड़ा उछाल दर्ज नहीं हुआ है और अधिकांश नए काम कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों तक सीमित रहे हैं। उपभोग सर्वेक्षणों पर आधारित इन नतीजों में वास्तविक कल्याणकारी बदलावों के साथ-साथ मापन विधियों में हुए सुधार का भी योगदान रहा है।















