23 मार्च
चैती छठ पूजा का चौथा और अंतिम दिन, जिसे “उषा अर्घ्य” कहा जाता है, इस पावन महापर्व का समापन दिवस होता है। वर्ष 2026 में यह दिन आस्था, तपस्या और समर्पण की पूर्णता का प्रतीक बनेगा, जब व्रती उगते हुए सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित कर अपने कठिन व्रत का पारण करेंगे।
संध्या अर्घ्य के बाद से ही व्रती अगली सुबह की तैयारी में लग जाते हैं। पूरी रात श्रद्धालु भक्ति गीतों, जागरण और पूजा-अर्चना में व्यतीत करते हैं। यह रात आध्यात्मिक ऊर्जा और विश्वास से भरपूर होती है, जहां हर व्रती अपने संकल्प की पूर्ति के अंतिम चरण की प्रतीक्षा करता है।
उषा काल में, जब सूर्य की पहली किरण क्षितिज पर प्रकट होती है, तब व्रती नदी, तालाब या अन्य पवित्र जलाशयों में खड़े होकर उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। यह क्षण अत्यंत भावनात्मक और दिव्य होता है, क्योंकि इसी के साथ 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत पूर्ण होता है।
अर्घ्य अर्पित करने के बाद व्रती छठी मैया और सूर्य देव से परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। इसके पश्चात वे प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण करते हैं और अपने संकल्प को पूर्ण करते हैं।
उषा अर्घ्य केवल व्रत के समापन का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह नए आरंभ, आशा और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश भी देता है। इस दिन उगते सूर्य की पूजा यह दर्शाती है कि हर कठिन तपस्या के बाद एक नई शुरुआत और उज्ज्वल भविष्य अवश्य आता है।

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