नई दिल्ली, 30 अप्रैल।
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण भारत के खजाने पर दबाव बढ़ता जा रहा है। मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में हो रही बढ़ोतरी से ऑयल मार्केटिंग कंपनियां भी 22 से 28 रुपये प्रति लीटर तक के नुकसान का सामना कर रही हैं। हालांकि, केंद्र सरकार ने हाल ही में पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कमी की थी, लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर कंपनियों के घाटे और क्रूड इंपोर्ट बिल पर दिखाई दे रहा है।
रेटिंग एजेंसी इक्रा के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट ने कहा कि कच्चे तेल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी से भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ सकता है, और फिस्कल डेफिसिट टारगेट भी प्रभावित हो सकता है। साथ ही, इसका असर भारतीय मुद्रा पर भी पड़ सकता है, जिससे रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो सकता है। इसके अलावा, महंगाई बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण भारत में विदेशी पूंजी की निकासी भी बढ़ सकती है, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था पर और दबाव आ सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों में इस बढ़ोतरी का प्रमुख कारण होर्मुज स्ट्रेट में जारी तनाव और अमेरिका द्वारा की गई नाकेबंदी को बताया जा रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ न्यूक्लियर डील के बिना होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी जारी रखने की बात कही है, जिससे कच्चे तेल की आपूर्ति पर असर पड़ा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हुआ है, जिससे ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमतों में 55 से 60 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। इस स्थिति ने पूरी दुनिया में तेल संकट को और गहरा दिया है, और कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है।











