न्यायपालिका
19 Apr, 2026

भोजशाला विवाद पर मप्र हाईकोर्ट में गरमाई बहस, धार्मिक अधिकारों को लेकर तर्क

भोजशाला मामले में हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने धार्मिक अधिकारों और स्वामित्व से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत तर्क रखे, जबकि अगली सुनवाई सोमवार को होगी।

इंदौर, 18 अप्रैल

मध्य प्रदेश के धार जिले स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर से जुड़े विवाद में उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में शनिवार को सुनवाई के दौरान तीखी बहस देखने को मिली। इस दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से तीन व्यक्तियों ने नया सिविल वाद प्रस्तुत किया। युगलपीठ के समक्ष इस पर सुनवाई हुई, लेकिन समय की कमी के चलते कार्यवाही अधूरी रह गई और अब अगली सुनवाई सोमवार को तय की गई है।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने लगभग दो घंटे तक विभिन्न याचिकाओं पर पक्षकारों की दलीलें सुनीं। आपसी सहमति से विवाद सुलझाने संबंधी याचिका पर बहस पूरी हो चुकी है। इसी बीच हस्तक्षेपकर्ता के रूप में सामने आए धार के नागरिकों द्वारा दायर आपत्तियों पर भी पक्ष रखा गया, जिसमें कहा गया कि भोजशाला को मंदिर साबित करने के कोई ठोस प्रमाण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए गए हैं और उपलब्ध तथ्यों के अनुसार यह एक पाठशाला रही है।

मुस्लिम पक्ष की ओर से अधिवक्ता अशहर वारसी ने कमाल मौला मस्जिद कमेटी का पक्ष रखते हुए भूमि के स्वामित्व, कब्जे और धार्मिक अधिकारों से जुड़े बिंदुओं पर विस्तार से तर्क रखे। उन्होंने सिविल वाद की वैधता पर भी जोर देते हुए कहा कि इस पर न्यायालय में स्पष्टता दी जा चुकी है। अधिवक्ता पूर्वी असाटी ने बताया कि अभी कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर बहस शेष है, जिसे अगली सुनवाई में विस्तार से रखा जाएगा।

दलीलों के दौरान दोनों पक्षों के बीच ऐतिहासिक दस्तावेजों को लेकर भी सवाल उठाए गए। वरिष्ठ अधिवक्ता एके चितले ने आपसी सहमति से समाधान निकालने पर बल देते हुए दोनों पक्षों के बीच सौहार्द बनाए रखने की अपील की। वहीं अन्य पक्षकारों की ओर से प्रस्तुत आपत्तियों में दायर याचिकाओं की वैधता पर ही प्रश्न खड़े किए गए और कई दस्तावेज न्यायालय में प्रस्तुत किए गए।

भोजशाला को मंदिर बताए जाने के दावे पर भी आपत्ति दर्ज कराई गई। मुस्लिम पक्ष ने कहा कि यह स्थल सदियों से मस्जिद के रूप में उपयोग में है और यहां नियमित रूप से नमाज अदा की जाती रही है। इसके विपरीत इसे मंदिर बताने के दावों को आधारहीन बताया गया और यह भी कहा गया कि इसे पाठशाला के रूप में वर्णित किया गया है।

सुनवाई के दौरान वाग्देवी की मूर्ति को लेकर भी तर्क सामने आए, जिसमें कहा गया कि संबंधित दस्तावेजों में यह उल्लेख है कि मूर्ति सिटी पैलेस से लाई गई थी, न कि भोजशाला परिसर से। इस आधार पर न्यायालय के समक्ष तथ्यों को छिपाने का आरोप भी लगाया गया। इसके साथ ही 1935 के गजट नोटिफिकेशन और 1904 के अधिनियम का हवाला देते हुए इस स्थल को मस्जिद बताया गया।

मुस्लिम पक्ष ने पूजा स्थल अधिनियम 1991 का उल्लेख करते हुए कहा कि 1947 में जो धार्मिक स्थल जिस रूप में था, वही स्थिति मान्य रहेगी। उनके अनुसार उस समय यह स्थल मस्जिद के रूप में था और इस अधिनियम के तहत विवाद की गुंजाइश नहीं है। साथ ही वक्फ अधिनियम का हवाला देते हुए कहा गया कि एक बार वक्फ घोषित संपत्ति हमेशा वक्फ ही रहती है और किसी भी आपत्ति के लिए उचित मंच वक्फ ट्रिब्यूनल है।

मालिकाना हक को लेकर भी सवाल उठाते हुए कहा गया कि यह संरक्षित इमारत है और वर्तमान में इसका स्वामित्व भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पास है। भूमि से जुड़े मामलों की सुनवाई का अधिकार सिविल न्यायालय को है, जिसके तहत धार जिला न्यायालय में पहले से मामला लंबित है।

सुनवाई के दौरान हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के दावों पर भी सवाल उठाए गए और कहा गया कि प्रस्तुत तथ्यों की कानूनी पुष्टि नहीं की गई है। वहीं जैन समाज की ओर से दायर याचिका पर भी पक्ष रखा गया, जिसमें सरकार द्वारा जवाब प्रस्तुत न करने पर आपत्ति जताई गई। बाद में सरकार द्वारा जवाब प्रस्तुत करने की जानकारी दिए जाने पर याचिका को मुख्य प्रकरण के साथ सुनने का अनुरोध किया गया, जिस पर अदालत ने सभी पक्षों को सुनने का भरोसा दिया।

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